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हिमाचल प्रदेश
नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में जीता शीर्ष सम्मान
Kiran
27 Oct 2026 3:04 PM IST

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सोलन जिले के नौनी स्थित डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान (प्लांट पैथोलॉजी) विभाग ने शिमला के ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) में 22 और 23 अक्टूबर को आयोजित 'जलवायु लचीलेपन, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियां' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में पोस्टर और मौखिक प्रस्तुति, दोनों श्रेणियों में शीर्ष सम्मान हासिल किया।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर के प्रमुख वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, छात्रों, किसानों, उद्योग प्रतिनिधियों और नीति निर्माताओं ने हिस्सा लिया। उन्होंने पादप स्वास्थ्य से जुड़ी उभरती चुनौतियों पर चर्चा की और जलवायु-अनुकूल कृषि, खाद्य सुरक्षा तथा टिकाऊ फसल सुरक्षा के लिए नई रणनीतियों पर विचार-मंथन किया। इस संगोष्ठी का आयोजन इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी, इंडियन पोटैटो एसोसिएशन, इंडियन सोसाइटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट्स और हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी ने संयुक्त रूप से, ICAR-IARI क्षेत्रीय केंद्र, शिमला के सहयोग से किया था।
कुलपति प्रो. एच.एस. बवेजा ने पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों से मुलाकात की और उन्हें उनकी इस उपलब्धि पर बधाई दी। उन्होंने विशेष रूप से पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष अनिल हांडा तथा उनकी टीम की सराहना की, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के सामने उच्च गुणवत्ता वाला वैज्ञानिक शोध प्रस्तुत किया और विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया।
प्रो. बवेजा ने कहा कि ये उपलब्धियां न केवल पादप रोग विज्ञान विभाग में हो रहे शोध के उच्च स्तर को दर्शाती हैं, बल्कि विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश करती हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
विजेताओं में, अमन चौहान ने पोस्टर प्रस्तुति श्रेणी में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। उन्होंने चेरी और प्लम के पेड़ों में फाइटोप्लाज्मा संक्रमण का तेजी से पता लगाने के लिए 'LAMP-आधारित जांच' (LAMP-based assay) पर शोध किया था। इस अध्ययन में अनिल हांडा, भूपेश गुप्ता और अजय ब्रकता भी सह-लेखक के रूप में शामिल थे। यह तकनीक एक घंटे के भीतर फाइटोप्लाज्मा संक्रमण का त्वरित और सटीक पता लगाने में सक्षम है। इससे बागवानी फसलों में फील्ड-स्तर पर बीमारियों की पहचान करने और बड़े पैमाने पर उनकी निगरानी करने की काफी संभावनाएं खुलती हैं। ओरल प्रेजेंटेशन श्रेणी में, शालिनी वर्मा, निकिता नेगी, सतीश कुमार शर्मा, गोपाल सिंह और अनन्या बेनल की टीम ने 'अनरेवेलिंग द इटियोलॉजी ऑफ इमर्जिंग पर्सिमोन लीफ ब्लाइट' (Unravelling the Etiology of Emerging Persimmon Leaf Blight) शीर्षक वाले अपने अध्ययन के लिए दूसरा पुरस्कार जीता। इस शोध में हिमाचल प्रदेश में इस बीमारी से जुड़े रोगजनकों (pathogens) के रूप में 'पेस्टालोटियोप्सिस क्लेविस्पोरा' (Pestalotiopsis clavispora) और 'पी. माइक्रोस्पोरा' (P. microspora) की पहचान की गई।
ओरल प्रेजेंटेशन श्रेणी में तीसरा पुरस्कार मीनू गुप्ता, मुस्कान ठाकुर, भूपेश गुप्ता और अनुपमा सिंह को उनके अध्ययन 'कल्चरल, मॉर्फोलॉजिकल एंड पैथोजेनिक वेरिएबिलिटी अमंग डिफरेंट आइसोलेट्स ऑफ अल्टरनेरिया एसपीपी कॉजिंग पर्पल ब्लॉच ऑफ गार्लिक (एलियम सैटिवम एल.)' (Cultural, Morphological and Pathogenic Variability among Different Isolates of Alternaria spp Causing Purple Blotch of Garlic (Allium sativum L)) के लिए दिया गया। यह अध्ययन लहसुन (एक आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण फसल) को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख बीमारी के लिए जिम्मेदार रोगजनकों के बीच पाई जाने वाली विभिन्नताओं पर प्रकाश डालता है। ये उपलब्धियां पादप रोगों की पहचान, रोगजनकों पर शोध, और बागवानी तथा कृषि फसलों की सुरक्षा के लिए विज्ञान-आधारित रणनीतियां विकसित करने में विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण योगदान को फिर से रेखांकित करती हैं।
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