हिमाचल प्रदेश

निजी स्कूल खोलना हुआ आसान खेल मैदान के मानकों में सरकार ने दी बड़ी राहत

Kavita2
14 Sept 2026 12:55 PM IST
निजी स्कूल खोलना हुआ आसान खेल मैदान के मानकों में सरकार ने दी बड़ी राहत
x

शिमला। हिमाचल प्रदेश की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित समतल जमीन को देखते हुए राज्य सरकार ने निजी स्कूल खोलने के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। शिक्षा विभाग ने निजी विद्यालयों के लिए अनिवार्य खेल मैदान के न्यूनतम क्षेत्रफल से संबंधित मानकों में संशोधन कर दिया है। नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। सरकार के इस फैसले से विशेष रूप से पहाड़ी और दूरदराज क्षेत्रों में स्कूल खोलने के इच्छुक निजी प्रबंधनों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

संशोधित नियमों के तहत अब प्री-प्राइमरी से पांचवीं कक्षा तक संचालित होने वाले निजी स्कूलों के लिए कम से कम 500 वर्गमीटर का खेल मैदान होना आवश्यक होगा। आठवीं और दसवीं कक्षा तक के विद्यालयों के लिए खेल मैदान का न्यूनतम क्षेत्रफल 800 वर्गमीटर तय किया गया है। वहीं जमा दो यानी बारहवीं कक्षा तक संचालित होने वाले निजी स्कूलों को कम से कम 1000 वर्गमीटर खेल मैदान की व्यवस्था करनी होगी।

नई व्यवस्था में खेल मैदान के लिए निर्धारित क्षेत्रफल पहले के मुकाबले आधा कर दिया गया है। इससे उन स्कूल प्रबंधनों को राहत मिलेगी जो भवन और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद पर्याप्त आकार का खेल मैदान नहीं होने के कारण मान्यता प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। हिमाचल प्रदेश के कई पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी और समतल जमीन मिलना बेहद मुश्किल है। ऐसे में पुराने मानकों को पूरा करना निजी शिक्षण संस्थानों के लिए चुनौती बना हुआ था।

राज्य के पर्वतीय इलाकों में अधिकांश आबादी छोटे-छोटे गांवों और दुर्गम क्षेत्रों में रहती है। यहां जमीन ढलानदार होने के साथ छोटे टुकड़ों में उपलब्ध होती है। कई स्थानों पर बड़ी जमीन खरीदने या उसे खेल मैदान के रूप में विकसित करने की लागत भी काफी अधिक होती है। इस वजह से नए स्कूल शुरू करने के इच्छुक प्रबंधनों को जमीन संबंधी मानक पूरा करने में परेशानी होती थी।

शिक्षा विभाग के संशोधन से अब पहाड़ी क्षेत्रों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप स्कूलों को खेल मैदान उपलब्ध कराने का अवसर मिलेगा। सरकार का उद्देश्य नियमों को व्यावहारिक बनाते हुए शिक्षा के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना और विद्यार्थियों के लिए स्कूलों की उपलब्धता बढ़ाना माना जा रहा है। हालांकि निजी स्कूलों को अन्य आवश्यक मानकों और सुरक्षा नियमों का पालन पहले की तरह करना होगा।

खेल मैदान के मानक में कमी का अर्थ यह नहीं है कि स्कूलों को बच्चों की खेल गतिविधियों की अनदेखी करने की अनुमति मिल गई है। संशोधित सीमा के अनुसार मैदान की व्यवस्था करना अब भी अनिवार्य रहेगा। स्कूल प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध जगह सुरक्षित हो और उसमें आयु के अनुसार खेलकूद तथा शारीरिक गतिविधियां कराई जा सकें।

विशेषज्ञों के अनुसार विद्यार्थियों के शारीरिक और मानसिक विकास में खेलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पढ़ाई के साथ नियमित खेलकूद बच्चों में अनुशासन नेतृत्व क्षमता टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित करता है। इसलिए क्षेत्रफल का मानक कम होने के बाद स्कूलों की जिम्मेदारी होगी कि उपलब्ध जमीन का योजनाबद्ध और प्रभावी उपयोग किया जाए।

छोटे मैदान वाले विद्यालय अलग-अलग कक्षाओं के लिए खेल का समय निर्धारित कर सकते हैं। सीमित जगह में योग व्यायाम बैडमिंटन टेबल टेनिस और अन्य गतिविधियों की व्यवस्था की जा सकती है। बड़े खेलों के लिए विद्यालय स्थानीय पंचायतों सार्वजनिक मैदानों या खेल विभाग की सुविधाओं का उपयोग करने की व्यवस्था भी कर सकते हैं। हालांकि ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था के संबंध में विभागीय दिशा-निर्देश स्पष्ट होना आवश्यक होगा।

सरकार के फैसले का लाभ ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे सकता है। इन क्षेत्रों में सरकारी स्कूल मौजूद होने के बावजूद अभिभावक बच्चों की शिक्षा के लिए अतिरिक्त विकल्प चाहते हैं। नए निजी स्कूल खुलने से विद्यार्थियों को दूर के कस्बों या शहरों तक यात्रा करने की जरूरत कम हो सकती है। इससे समय और परिवहन खर्च दोनों की बचत होने की संभावना है।

दूसरी ओर नियमों में दी गई छूट के बाद निजी विद्यालयों की मान्यता और निरीक्षण प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी। केवल खेल मैदान का क्षेत्रफल पूरा करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। स्कूल भवन की मजबूती अग्नि सुरक्षा स्वच्छ पेयजल शौचालयों की उपलब्धता प्रशिक्षित शिक्षक और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित परिवहन जैसी सुविधाओं की नियमित जांच भी जरूरी है।

शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि संशोधित नियम का अनुचित लाभ लेकर बेहद सीमित या असुरक्षित परिसरों में स्कूल संचालित न किए जाएं। मान्यता देने से पहले उपलब्ध जमीन का भौतिक सत्यापन और खेल मैदान के वास्तविक उपयोग की जांच महत्वपूर्ण होगी। निर्धारित क्षेत्र को पार्किंग निर्माण सामग्री रखने या व्यावसायिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

अभिभावकों के लिए भी यह जरूरी है कि किसी निजी स्कूल में बच्चों का प्रवेश कराने से पहले उसकी मान्यता भवन सुरक्षा शिक्षकों की योग्यता और खेल सुविधाओं की जानकारी लें। केवल आकर्षक भवन या विज्ञापन के आधार पर विद्यालय का चयन करने के बजाय पढ़ाई और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सभी पहलुओं की जांच करनी चाहिए।

निजी स्कूल संचालकों के लिए यह संशोधन आर्थिक रूप से भी राहत देने वाला हो सकता है। पहले बड़े खेल मैदान के लिए अधिक जमीन खरीदनी या लीज पर लेनी पड़ती थी। पहाड़ी नगरों और कस्बों में जमीन की कीमत अधिक होने के कारण स्कूल परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती थी। न्यूनतम क्षेत्रफल घटने से जमीन पर होने वाला खर्च कम हो सकता है और छोटे प्रबंधन भी स्कूल खोलने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

इस फैसले से निजी शिक्षा का विस्तार होने की संभावना है लेकिन सरकार के सामने गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी। यदि स्कूलों की संख्या बढ़ती है तो विभाग को निरीक्षण व्यवस्था और शिकायत निवारण तंत्र भी मजबूत करना होगा। विद्यार्थियों के हितों को प्राथमिकता देते हुए फीस शिक्षकों की नियुक्ति और बुनियादी सुविधाओं पर निगरानी आवश्यक होगी।

कुल मिलाकर खेल मैदान के मानकों में किया गया संशोधन हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए उठाया गया कदम माना जा रहा है। इससे निजी स्कूल खोलने की राह आसान होगी और पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा के नए विकल्प विकसित हो सकेंगे। अब इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्कूल प्रबंधन उपलब्ध स्थान का किस तरह इस्तेमाल करते हैं और शिक्षा विभाग मानकों का पालन कितनी प्रभावी तरीके से सुनिश्चित करता है।

Next Story