हिमाचल प्रदेश

200 साल पुराने बरगद के पेड़ के चबूतरे पर NGT सख्त, वन विभाग से मांगा स्पष्टीकरण

Kavita2
13 Aug 2026 5:02 PM IST
200 साल पुराने बरगद के पेड़ के चबूतरे पर NGT सख्त, वन विभाग से मांगा स्पष्टीकरण
x

शिमला। हिमाचल प्रदेश के संरक्षित वन क्षेत्र में करीब 200 वर्ष पुराने बरगद के पेड़ के चारों ओर बनाए गए सुरक्षात्मक चबूतरे के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी ने इस मामले में प्रदेश वन विभाग से स्पष्टीकरण मांगा है और अधिकारियों से जवाब तलब किया है।

यह मामला परमजीत मनकोटिया बनाम हिमाचल सरकार एवं अन्य के रूप में एनजीटी के समक्ष विचाराधीन है। मामले की सुनवाई 11 अगस्त को एनजीटी की प्रधानपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान प्रधानपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद ने संबंधित अधिकारियों की ओर से दाखिल जवाब पर विचार किया।

आवेदक की ओर से संरक्षित वन क्षेत्र में स्थित प्राचीन बरगद के पेड़ के चारों ओर कथित रूप से बिना आवश्यक अनुमति के सुरक्षात्मक चबूतरा बनाए जाने पर आपत्ति जताई गई है। याचिका में कहा गया है कि वन क्षेत्र में किसी भी तरह का निर्माण कार्य करने से पहले निर्धारित नियमों और अनुमति प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है।

आवेदक का आरोप है कि बरगद जैसे पुराने और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पेड़ के आसपास निर्माण करने से पहले संबंधित विभागों से आवश्यक स्वीकृति नहीं ली गई। उन्होंने इस मामले में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की आशंका जताते हुए एनजीटी से हस्तक्षेप की मांग की है।

सुनवाई के दौरान एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत जवाब पर विचार किया और मामले से जुड़े कई पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा। अधिकरण यह जानना चाहता है कि चबूतरे के निर्माण के लिए किन नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया था।

एनजीटी ने वन विभाग से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि क्या संरक्षित वन क्षेत्र में इस तरह के निर्माण की अनुमति दी गई थी या नहीं। इसके अलावा निर्माण कार्य से जुड़े दस्तावेज और अनुमति प्रक्रिया की जानकारी भी मांगी जा सकती है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने पेड़ प्राकृतिक विरासत का हिस्सा होते हैं और उनके संरक्षण के लिए विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। कई बार पेड़ों के आसपास किए गए निर्माण कार्य उनके प्राकृतिक विकास और जड़ों को प्रभावित कर सकते हैं।

बरगद के पेड़ को भारतीय संस्कृति और पर्यावरण दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। 200 वर्ष पुराने पेड़ का संरक्षण पर्यावरणीय दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।

मामले में एनजीटी का रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संरक्षित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की गतिविधि को लेकर कड़े नियम लागू होते हैं। ऐसे क्षेत्रों में निर्माण या बदलाव से पहले पर्यावरणीय प्रभाव और कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी होता है।

वन विभाग की ओर से इस मामले में आगे विस्तृत जवाब दाखिल किए जाने की संभावना है। विभाग को यह बताना होगा कि चबूतरे का निर्माण किस उद्देश्य से किया गया और इसके लिए कौन-कौन सी अनुमति ली गई थी।

स्थानीय स्तर पर भी इस मामले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पुराने पेड़ों का संरक्षण प्राथमिकता होनी चाहिए और किसी भी तरह के निर्माण कार्य में वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मानकों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

एनजीटी की सुनवाई के बाद अब सभी की नजर वन विभाग के जवाब पर है। विभाग द्वारा प्रस्तुत जानकारी के आधार पर अधिकरण आगे की कार्रवाई तय करेगा।

फिलहाल मामला एनजीटी में लंबित है और बरगद के पुराने पेड़ के आसपास बनाए गए चबूतरे को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी है।

Next Story