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- हिमालय में जलवायु संकट...

अवंतीपोरा। जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने हिमालयी क्षेत्र में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन पर चिंता व्यक्त करते हुए विकास की नीतियों में प्रकृति आधारित समाधानों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन की गति बेहद तेज हो चुकी है और इसके प्रभाव के रूप में लगातार प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है।
उप-राज्यपाल सोमवार को अवंतीपोरा स्थित इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) में आयोजित जलवायु सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। इस दौरान मनोज सिन्हा ने कहा कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल संसाधनों और जैव विविधता का आधार है। इसलिए इसकी सुरक्षा पूरे देश के भविष्य से जुड़ा विषय है।
उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के असर को अब स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। मौसम के बदलते पैटर्न, अनियमित बारिश, बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि पर्यावरणीय संतुलन तेजी से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच हिमालयी क्षेत्र में लगभग हर दिन किसी न किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा दर्ज की गई, जो जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को दर्शाता है।
मनोज सिन्हा ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक विकास मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय प्रकृति आधारित समाधानों को अपनाना होगा। ऐसे समाधान न केवल पर्यावरण की रक्षा करेंगे, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी लंबे समय तक लाभ पहुंचाएंगे।
उन्होंने जल संरक्षण, जंगलों के संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को जलवायु परिवर्तन से निपटने के महत्वपूर्ण उपायों के रूप में बताया। उप-राज्यपाल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास योजनाएं तैयार करते समय स्थानीय पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
सम्मेलन में उन्होंने युवाओं और शिक्षण संस्थानों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय और शोध संस्थान जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों को समझने और उनके समाधान खोजने में अहम योगदान दे सकते हैं। वैज्ञानिक शोध, नवाचार और स्थानीय अनुभवों के आधार पर ऐसी नीतियां बनाई जा सकती हैं, जो भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने में मदद करें।
उप-राज्यपाल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर कृषि, पर्यटन, जल उपलब्धता और लोगों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाले लोगों के लिए पर्यावरणीय बदलाव सीधे तौर पर जीवन से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसमें भागीदारी करनी होगी। स्थानीय लोगों, संस्थानों, वैज्ञानिकों और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल से ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है।
जलवायु सम्मेलन में विशेषज्ञों ने भी हिमालयी क्षेत्रों में बदलते पर्यावरणीय हालात पर अपने विचार रखे। उन्होंने बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव, जल स्रोतों पर दबाव और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं पर चर्चा की। विशेषज्ञों का कहना था कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र बेहद संवेदनशील है और यहां होने वाले छोटे बदलाव भी बड़े प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
मनोज सिन्हा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित रखते हुए विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना सरकार की प्रतिबद्धता है।
उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। हिमालय की रक्षा केवल एक क्षेत्र विशेष का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया के पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा विषय है।
सम्मेलन के माध्यम से विशेषज्ञों, छात्रों और नीति निर्माताओं के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम में इस बात पर सहमति जताई गई कि हिमालयी क्षेत्र को बचाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सतत विकास और प्रकृति आधारित समाधान अपनाना समय की मांग है।





