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जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने मंगलवार को भाजपा विधायकों के विरोध के बाद मंत्रियों और विधायकों के वेतन और भत्तों में संशोधन की मांग वाले दो विधेयक वापस ले लिए। विधेयक में मंत्रियों और राज्य मंत्रियों के वेतन अधिनियम, 1956 और जम्मू-कश्मीर राज्य विधानमंडल के सदस्यों के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1960 में संशोधन का प्रस्ताव है। दोनों को सोमवार को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में पेश किया था।
जैसा कि भाजपा विधायकों ने प्रस्तावित संशोधनों के खिलाफ नारे लगाए, उमर ने सदन से कहा कि वह विधेयकों पर तब तक दबाव नहीं डालेंगे जब तक कि वे सर्वसम्मति से पारित नहीं हो जाते। वरिष्ठ भाजपा नेता और विधायक शाम लाल शर्मा ने प्रस्तावों का विरोध करते हुए तर्क दिया कि सरकार को इसके बजाय दैनिक वेतनभोगियों और संविदा कर्मचारियों को राहत प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
आलोचना का जवाब देते हुए, मुख्यमंत्री ने दैनिक वेतनभोगियों के लिए भाजपा की घोषित चिंता पर सवाल उठाया, यह देखते हुए कि इसके किसी भी सदस्य ने मंत्रियों और विधायकों के लिए प्रस्तावित वेतन संशोधन की जांच करने वाली समिति के समक्ष असहमति दर्ज नहीं की थी। उमर ने दोहराया कि उन्होंने अपने सहयोगियों को सदन में सर्वसम्मति के समर्थन के बिना बिलों को आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा कि जब भाजपा सदस्य वेतन और भत्ते की मांग कर रहे थे, तो साथ ही वे दिहाड़ी मजदूरों की समस्याओं का हवाला देकर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का प्रयास कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा, "मैं कभी इसके पक्ष में नहीं था। मेरे विधायकों से पूछो। अगर एक भी सदस्य विरोध करता है, तो यह कभी पारित नहीं होगा। मैं विधेयक वापस लेता हूं।"
इसके बाद, स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने विधेयकों को मतदान के लिए रखा और उन्हें वापस ले लिया गया। हालाँकि, सदन ने जम्मू-कश्मीर राज्य विधानमंडल सदस्यों के पेंशन अधिनियम, 1984 में संशोधन की मांग करने वाले विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया। हालाँकि मुख्यमंत्री ने पेंशन संशोधन विधेयक को वापस लेने की भी मांग की थी, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्यों ने तर्क दिया कि यह कानून सेवानिवृत्त विधायकों से संबंधित है और इसलिए इसे बरकरार रखा जाना चाहिए और पारित किया जाना चाहिए।
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