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Chamba चंबा के दूर-दराज़ इलाके में बसे रेता गाँव का नाम अब एशियाई खेलों के नक्शे पर आ गया है। गाँव की बेटी सीमा कुमारी ने गुरुवार को जापान के आइची-नागोया में महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में ऐतिहासिक ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। सीमा ने कड़ी टक्कर वाली इस दौड़ को 32 मिनट 50.05 सेकंड में पूरा करके तीसरा स्थान हासिल किया। इसके साथ ही उन्होंने एशियाई खेलों में भारत को एथलेटिक्स का पहला मेडल दिलाया और महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में मेडल के लिए देश के 16 साल के इंतज़ार को खत्म किया।
बहरीन की विनफ्रेड यावी ने 32:39.18 के समय के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि जापान की नोज़ोमी तनाका ने 32:41.54 के समय के साथ सिल्वर मेडल हासिल किया। शुरुआती दौर में आगे रहने वाली सीमा दौड़ के बीच में पिछड़ गई थीं, लेकिन आखिरी लैप्स में उन्होंने ज़बरदस्त वापसी करते हुए ब्रॉन्ज़ मेडल पक्का किया। उनकी यह कामयाबी महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में भारत के लिए एशियाई खेलों का तीसरा मेडल है। इससे पहले भारत को 2010 के एशियाई खेलों में मेडल मिले थे, जब प्रीजा श्रीधरन ने गोल्ड और कविता राउत ने सिल्वर मेडल जीता था।
चंबा की यह एथलीट अब दो दिन बाद 5,000 मीटर स्पर्धा में हिस्सा लेंगी। पोडियम पर ऐतिहासिक जीत के बाद उनसे उम्मीदें और बढ़ गई हैं। सीमा कुमारी के लिए एशियाई खेलों का यह मेडल एक शानदार सफ़र का नतीजा है, जिसकी शुरुआत चंबा की पहाड़ियों में मुश्किल हालात के बीच हुई थी। जब वह सिर्फ़ 12 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका परिवार गुज़ारे के लिए मुख्य रूप से खेती और पशुपालन पर निर्भर हो गया।
एक रनर के तौर पर शुरुआती दिनों में सीमा के पास दौड़ने के लिए सही जूते तक नहीं थे। उनके हुनर की पहचान सबसे पहले स्कूल की प्रतियोगिताओं में हुई, जहाँ से वह ज़िला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुँचीं। उनकी ज़िंदगी में एक बड़ा मोड़ 2015 में आया, जब धर्मशाला में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के हॉस्टल के लिए उनका चयन हुआ। प्रोफेशनल कोचिंग और बेहतर ट्रेनिंग सुविधाओं ने उन्हें नेशनल एथलेटिक्स सर्किट तक पहुँचने में मदद की। उस साल, उन्होंने रांची में जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता।
इसके बाद सीमा ने खुद को एक होनहार लॉन्ग-डिस्टेंस रनर के तौर पर स्थापित किया। उन्होंने 2,000 मीटर और 3,000 मीटर इवेंट्स में जूनियर नेशनल रिकॉर्ड बनाए और नेशनल टाइटल जीते। 2018 में वह 'खेलो इंडिया' प्रोग्राम का भी हिस्सा बनीं।
इंटरनेशनल लेवल पर उनकी कामयाबी के सफर में उनके जज़्बे की एक और परीक्षा हुई। जब उन्होंने बैंकॉक में एशियन यूथ चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई किया, तो बताया जाता है कि उनकी मां ने उनके हिस्सा लेने का खर्च उठाने के लिए अपनी फिक्स्ड डिपॉज़िट (FD) तुड़वा दी थी। सीमा ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर लौटीं, जिससे उनके सफल इंटरनेशनल करियर का रास्ता खुल गया। बाद में उन्होंने 2018 यूथ एशियन ओलंपिक्स क्वालिफाइंग गेम्स में सिल्वर मेडल जीता।
2024 में, उन्होंने हांगकांग में 17वीं एशियन क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप के 10,000 मीटर इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी काबिलियत साबित की। एशियन गेम्स से पहले, 10,000 मीटर रेस में सीमा का पर्सनल बेस्ट समय 32:02.43 था। ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद, सीमा ने कहा कि उनका अगला लक्ष्य 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक्स है। उन्होंने कहा कि एशियन गेम्स का मेडल उनकी रफ़्तार कम करने की वजह नहीं बनेगा और वह भारत के लिए ओलंपिक मेडल जीतने के मकसद से और कड़ी मेहनत करेंगी। चंबा के एक दूर-दराज़ गांव में बिना सही जूतों के दौड़ने से लेकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने तक, सीमा कुमारी ने मुश्किलों भरे बचपन को हिमाचल प्रदेश और भारतीय एथलेटिक्स के लिए एक बड़ी कामयाबी में बदल दिया है।
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