हिमाचल प्रदेश

HC का फैसला: गरीब कैदियों को पैरोल में राहत, “गरीबी अपराध नहीं”

Kavita2
4 July 2026 10:13 AM IST
HC का फैसला: गरीब कैदियों को पैरोल में राहत, “गरीबी अपराध नहीं”
x

हिमाचल प्रदेश ; हाई कोर्ट ने गरीब और असहाय कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल आर्थिक तंगी या शर्तें पूरी न कर पाने के कारण किसी कैदी की पैरोल को रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को समाज और परिवार से जोड़कर रखना है, न कि उसे केवल सजा की कठोरता में सीमित रखना।

यह फैसला न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकलपीठ ने सुनाया। मामला कंडा जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी की याचिका से जुड़ा था। कैदी ने पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण आवश्यक शर्तों को पूरा करने में कठिनाई आ रही थी। इस आधार पर उसे राहत नहीं मिल पा रही थी, जिसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर विस्तार से विचार किया और पाया कि केवल गरीबी के कारण किसी कैदी को पैरोल से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि कैदियों को भी समान अवसर और राहत की प्रक्रिया उपलब्ध कराई जाए।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि कैदी को उत्तर प्रदेश के जिला मजिस्ट्रेट के बजाय सीधे कंडा जेल अधीक्षक के समक्ष व्यक्तिगत बांड भरने की अनुमति दी जाती है। इस निर्णय से याचिकाकर्ता को पैरोल प्रक्रिया में बड़ी राहत मिली है और प्रशासनिक औपचारिकताओं में भी सरलता आई है।

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में गुजरात और राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों के आधार पर अदालत ने दोहराया कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को उसके परिवार और समाज से जुड़े रहने का अवसर देना है, ताकि वह मानसिक और सामाजिक रूप से संतुलित रह सके।

अदालत ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “गरीबी कोई अपराध नहीं है” और इसे किसी भी प्रकार की कानूनी राहत से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि पुनर्वास और मानवता के सिद्धांतों को भी बनाए रखना है।

इस फैसले को मानवाधिकारों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि यह उन कैदियों के लिए राहत का रास्ता खोलता है जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण पैरोल की प्रक्रिया में बाधाओं का सामना करते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न्याय व्यवस्था में एक सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है, जहां अदालतें केवल तकनीकी पहलुओं पर नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण को भी महत्व दे रही हैं।

इस फैसले के बाद जेल प्रशासन और पैरोल प्रक्रिया से जुड़े नियमों में भी अधिक लचीलापन आने की संभावना जताई जा रही है। इससे उन कैदियों को राहत मिल सकती है जो लंबे समय से आर्थिक या सामाजिक कारणों से पैरोल सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रहे थे।

कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल एक व्यक्तिगत मामले में राहत देने वाला है, बल्कि यह पूरे न्याय तंत्र में मानवता और समानता के सिद्धांतों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अदालत का यह रुख यह संदेश देता है कि न्याय व्यवस्था में हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी आर्थिक स्थिति में हो, समान अधिकार और सम्मान का हकदार है।

Next Story