हिमाचल प्रदेश

कुल्लू दशहरा का भव्य आगाज, भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब

Kavita2
21 Oct 2026 5:55 PM IST
कुल्लू दशहरा का भव्य आगाज, भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब
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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का भव्य शुभारंभ हो गया है। सात दिवसीय इस महोत्सव के पहले दिन कुल्लू की देव संस्कृति, धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिला। भगवान रघुनाथ जी की पारंपरिक रथयात्रा के साथ उत्सव की शुरुआत हुई। इस दौरान ढालपुर मैदान में सैकड़ों देवी-देवताओं के आगमन और देव मिलन की परंपरा ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। उत्सव में राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस वर्ष दशहरा उत्सव समिति की ओर से 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है, जबकि वर्ष 2025 में 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था। इस तरह इस बार आमंत्रित देवी-देवताओं की संख्या में 15 की बढ़ोतरी हुई है।

भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा से हुआ शुभारंभ

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा रही। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली गई।

रथयात्रा के दौरान धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति का विशेष वातावरण देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन का हिस्सा बने।

कुल्लू दशहरा की विशेषता यह है कि यहां भगवान रघुनाथ जी को प्रमुख आराध्य मानकर उत्सव की परंपराएं निभाई जाती हैं।

रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुल्लू घाटी की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ढालपुर मैदान में हुआ देवी-देवताओं का मिलन

कुल्लू दशहरा में देव मिलन की परंपरा विशेष महत्व रखती है। उत्सव के पहले दिन विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों देवी-देवताओं के रथ और प्रतीक ढालपुर मैदान पहुंचे।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कुल्लू घाटी के देवी-देवताओं का इस अवसर पर एकत्र होना धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

देवताओं के साथ आने वाले प्रतिनिधि और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।

ढालपुर मैदान में होने वाला यह देव मिलन कुल्लू दशहरा को देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देता है।

इस बार 347 देवी-देवताओं को भेजा निमंत्रण

इस वर्ष कुल्लू दशहरा उत्सव समिति ने 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया है।

पिछले वर्ष यानी 2025 में समिति ने 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया था।

इस प्रकार इस बार निमंत्रण की संख्या में 15 की वृद्धि हुई है।

हालांकि, निमंत्रण भेजे जाने और सभी देवी-देवताओं के उत्सव में पहुंचने की संख्या अलग-अलग हो सकती है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उत्सव के पहले दिन सैकड़ों देवी-देवता ढालपुर मैदान पहुंचे।

आमंत्रित सभी देवी-देवताओं की उपस्थिति की अंतिम संख्या की पुष्टि अलग से होनी बाकी है।

राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता हुए शामिल

सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के उद्घाटन कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविन्द्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उनकी उपस्थिति ने इस पारंपरिक आयोजन को राजकीय स्तर पर विशेष महत्व दिया।

कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख उत्सव है। इसमें स्थानीय देव परंपराओं के साथ राज्य की लोक संस्कृति को भी प्रमुखता मिलती है।

इस तरह के आयोजन धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग है कुल्लू दशहरा

देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन और रामलीला के साथ दशहरा मनाया जाता है।

लेकिन कुल्लू दशहरा की परंपरा कुछ अलग है। यहां विजयादशमी से सात दिवसीय उत्सव की शुरुआत होती है।

भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा और विभिन्न देवी-देवताओं का मिलन इस आयोजन के केंद्र में रहता है।

इसी अनूठी परंपरा के कारण कुल्लू दशहरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली है।

यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय समाज की सांस्कृतिक एकजुटता को भी प्रदर्शित करता है।

सदियों पुरानी देव संस्कृति की झलक

कुल्लू घाटी अपनी समृद्ध देव परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां अनेक गांवों और क्षेत्रों की अपनी धार्मिक मान्यताएं तथा आराध्य देवी-देवता हैं।

कुल्लू दशहरा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों की ये परंपराएं एक स्थान पर दिखाई देती हैं।

देवताओं के रथ, पारंपरिक वाद्ययंत्र और स्थानीय रीति-रिवाज इस उत्सव को विशिष्ट बनाते हैं।

भगवान रघुनाथ जी से जुड़ी कुल्लू दशहरा की परंपरा का इतिहास 17वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है।

समय के साथ उत्सव का स्वरूप विस्तृत हुआ है, लेकिन देव मिलन और रथयात्रा जैसी प्रमुख परंपराएं आज भी इसकी पहचान बनी हुई हैं।

लोक संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय पहचान का संगम

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति को व्यापक मंच प्रदान करता है।

उत्सव के दौरान स्थानीय वेशभूषा, पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक विरासत का महत्व सामने आता है।

इस महोत्सव की अंतरराष्ट्रीय पहचान देश-विदेश के लोगों को हिमाचल की संस्कृति से परिचित कराने का अवसर प्रदान करती है।

सात दिवसीय आयोजन के दौरान धार्मिक गतिविधियों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी उत्सव की व्यापक पहचान का हिस्सा रहते हैं।

पर्यटन और स्थानीय कारोबार के लिए महत्वपूर्ण

कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में शामिल है।

ऐसे बड़े आयोजनों से स्थानीय होटल, परिवहन, भोजनालय और हस्तशिल्प से जुड़े व्यवसायों को अवसर मिल सकते हैं।

उत्सव के दौरान बाहर से आने वाले पर्यटक कुल्लू की धार्मिक परंपराओं और प्राकृतिक सुंदरता से परिचित होते हैं।

स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक कलाओं को भी अपनी पहचान बढ़ाने का अवसर मिलता है।

हालांकि, इस वर्ष उत्सव में पर्यटकों की कुल संख्या और संभावित आर्थिक गतिविधियों के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

सात दिनों तक जारी रहेगा उत्सव

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव सात दिनों तक चलेगा। इस दौरान भगवान रघुनाथ जी से जुड़ी धार्मिक परंपराओं और देव संस्कृति के विभिन्न स्वरूप देखने को मिलेंगे।

उत्सव का मुख्य केंद्र ढालपुर मैदान रहेगा, जहां विभिन्न देवी-देवताओं की उपस्थिति आयोजन को विशेष बनाती है।

सात दिवसीय उत्सव स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक आस्था का अवसर है, जबकि पर्यटकों के लिए हिमाचल की संस्कृति को करीब से देखने का मौका है।

नई पीढ़ी तक पहुंच रही परंपरा

कुल्लू दशहरा जैसे आयोजन सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब बच्चे और युवा रथयात्रा, देव मिलन तथा पारंपरिक आयोजनों में भाग लेते हैं, तो उन्हें अपनी संस्कृति को समझने का अवसर मिलता है।

स्थानीय परंपराओं को सामूहिक रूप से निभाने से उनके संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।

इस दृष्टि से कुल्लू दशहरा केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।

देव आस्था के साथ शुरू हुआ भव्य महोत्सव

हिमाचल प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का पहला दिन भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा और देवी-देवताओं के मिलन के नाम रहा।

इस वर्ष 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजे जाने से आयोजन के व्यापक स्वरूप का संकेत मिलता है।

ढालपुर मैदान में सैकड़ों देवी-देवताओं की उपस्थिति और पारंपरिक रथयात्रा ने उत्सव को विशेष बना दिया। सात दिनों तक चलने वाला यह महोत्सव धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

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