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Delhi सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन के पूर्व सिक्योंग (प्रमुख) लोबसांग सांगे ने चेतावनी दी है कि बीजिंग, दलाई लामा के उत्तराधिकारी के मुद्दे का इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपने क्षेत्रीय दावों को आगे बढ़ाने और हिमालयी क्षेत्र में अपना असर जमाने के लिए कर सकता है। उन्होंने कहा कि चीन द्वारा नियुक्त उत्तराधिकारी एक "मज़ाक" और "नकली" होगा। सांगे ने कहा, "अगर बीजिंग अपना खुद का दलाई लामा नियुक्त करता है, तो वह एक मज़ाक और नकली होगा।" उन्होंने तर्क दिया कि तिब्बती लोग उसी उत्तराधिकारी को मानेंगे जिसे दलाई लामा द्वारा अधिकृत धार्मिक प्रक्रिया के ज़रिए चुना गया हो।
दलाई लामा ने हाल ही में कहा था कि यह संस्था बनी रहेगी और उनके पुनर्जन्म को मान्यता देने का एकमात्र अधिकार 'गाडेन फोड्रंग ट्रस्ट' के पास होगा। बीजिंग ने इस बात को खारिज कर दिया है और उसका कहना है कि पुनर्जन्म की प्रक्रिया में चीनी कानूनों, नियमों और ऐतिहासिक परंपराओं का पालन किया जाना चाहिए। सांगे ने कहा कि बीजिंग अपने उम्मीदवार का इस्तेमाल लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, भूटान और नेपाल पर अपने दावों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकता है, जिससे उत्तराधिकार का मुद्दा भारत-चीन के बीच रणनीतिक मुकाबले का एक और अखाड़ा बन जाएगा। उनकी यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब उत्तराधिकार का सवाल भू-राजनीतिक रूप ले रहा है। पिछले महीने जारी 'यूएस-चीन इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन' की एक रिपोर्ट में उत्तराधिकार के मुद्दे को चीन, भारत और अमेरिका से जुड़ी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बताया गया और कहा गया कि इस मुकाबले में भारत की भूमिका अहम होगी। सांगे ने कहा कि इसलिए भारत को इस मुद्दे को सिर्फ़ धर्म के नज़रिए से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिए से भी देखना चाहिए।
उन्होंने तिब्बती धार्मिक प्रक्रिया से चुने गए उत्तराधिकारी और चीनी सरकार द्वारा नियुक्त उत्तराधिकारी के बीच अंतर बताते हुए पूछा, "आप कौन सा दलाई लामा चाहते हैं?" तिब्बत के पूर्व राजनीतिक नेता ने भारत को यह सोचने के प्रति भी आगाह किया कि बीजिंग के साथ संबंधों में हालिया सुधार से दोनों देशों के बीच रणनीतिक रिश्तों में कोई बुनियादी बदलाव आया है।
उन्होंने कहा, "चीन के साथ आपके संबंध होने चाहिए, लेकिन हमेशा जांच-पड़ताल करें। सिर्फ़ भरोसा न करें।" सांगे ने भारत और चीन को "ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिस्पर्धी और कम से कम प्रतिद्वंद्वी" बताया और कहा कि बीजिंग का लंबे समय का मकसद भारत के आगे बढ़ने को रोकना है। चीन के इलाक़ों पर दावे और भारत के पड़ोस में उसकी बढ़ती मौजूदगी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नई दिल्ली को 1962 की लड़ाई, डोकलाम और गलवान झड़प से सबक लेने की ज़रूरत है।
उनकी ये बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट के दौरान हुई मुलाक़ात के कुछ हफ़्ते बाद आई हैं। दोनों नेताओं ने आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और हितों के साथ-साथ सीमा पर शांति और स्थिरता के महत्व पर ज़ोर देते हुए द्विपक्षीय संबंधों पर रणनीतिक और दीर्घकालिक नज़रिए से काम करने पर सहमति जताई। उन्होंने व्यापार में संरचनात्मक असंतुलन और सप्लाई-चेन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की।
सांगे ने कहा कि भारत को चीन पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने के बजाय अपनी सप्लाई-चेन में विविधता लानी चाहिए और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मज़बूत करना चाहिए। उन्होंने इस विचार पर भी सवाल उठाया कि भारत और चीन मिलकर 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व कर सकते हैं; उन्होंने कहा कि बीजिंग की अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं की वजह से ऐसी साझेदारी मुश्किल है। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के साथ भारत का लंबे समय से जुड़ाव रहा है और उसे अपना नेतृत्व बनाए रखना चाहिए।
सांगे को उम्मीद है कि चीन 2027 में अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता का इस्तेमाल समूह के भीतर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करेगा। नई दिल्ली ब्रिक्स घोषणापत्र में औपचारिक रूप से 2027 के लिए चीन की अध्यक्षता का समर्थन किया गया। उन्होंने कहा, "चीन निश्चित रूप से ब्रिक्स को भारत के बजाय अपनी ओर ज़्यादा झुकाएगा," और तर्क दिया कि नई दिल्ली को 'ग्लोबल साउथ' में अपनी नेतृत्व की भूमिका बनाए रखनी चाहिए। पूर्व सिक्योंग ने तिब्बत के पठार से निकलने वाले जल संसाधनों के प्रबंधन को लेकर भारत और अन्य हिमालयी व निचले इलाकों वाले देशों के बीच बेहतर तालमेल की भी वकालत की।
उन्होंने कहा कि तिब्बत को एशिया के "वॉटर टावर" (जल स्रोत) के तौर पर देखा जाना चाहिए और तर्क दिया कि तिब्बत के पठार से बहने वाली नदियों को लेकर ज़्यादा पारदर्शिता और सहयोग सुनिश्चित करने में भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के साझा हित हैं। उन्होंने तिब्बत में बुनियादी ढांचे, बांधों और पारिस्थितिक बदलावों पर भी चिंता जताई, हालांकि पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में उनके कई विशिष्ट दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि की ज़रूरत है। सांगे ने आरोप लगाया कि हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ के दौरान चीन ने तिब्बत की तरफ हुए नुकसान के बारे में जानकारी छिपाई थी, क्योंकि पत्रकारों और जांचकर्ताओं की प्रभावित इलाकों तक पहुंच सीमित थी।
हालांकि, उन्होंने कहा कि भारत के लिए तिब्बत, हिमालयी क्षेत्र के साथ उसके व्यापक रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों का एक अभिन्न अंग बना हुआ है। भारत को तिब्बत का "सबसे बड़ा समर्थक" बताते हुए सांगे ने कहा कि किसी अन्य देश ने तिब्बती लोगों के लिए इतना कुछ नहीं किया है। उन्होंने भारत और तिब्बत को भूगोल, संस्कृति और इतिहास से जुड़े "भाई-बहन" के रूप में वर्णित किया।
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