हिमाचल प्रदेश

हमीरपुर में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट शुरू

Kavita2
9 Aug 2026 10:10 AM IST
हमीरपुर में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट शुरू
x

हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। नेरी स्थित डॉ. वाई.एस. परमार हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री यूनिवर्सिटी के कैंपस में रोजाना 1.5 टन क्षमता वाला स्वदेशी बायोचार प्लांट शुरू किया गया है। यह प्लांट विशेष रूप से जंगलों से निकलने वाले बायोमास, खासकर तेजी से आग पकड़ने वाली चीड़ की पत्तियों यानी चिर पाइन नीडल्स को उपयोगी उत्पाद में बदलने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

अधिकारियों के अनुसार, यह भारत का पहला स्वदेशी रूप से डिजाइन किया गया बायोचार प्लांट है, जिसे विशेष तौर पर वन क्षेत्र से प्राप्त बायोमास को प्रोसेस करने के लिए तैयार किया गया है। इस परियोजना को हिमालयी राज्यों में हर साल सामने आने वाली जंगल की आग की समस्या से निपटने और वन संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन के लिए संभावित मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है।

जंगल की आग के खतरे को कम करने की कोशिश

हिमाचल प्रदेश समेत कई हिमालयी राज्यों में गर्मियों के दौरान जंगलों में आग लगने की घटनाएं चिंता का विषय बनी रहती हैं। चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पाइन नीडल्स जंगल की जमीन पर बड़ी मात्रा में जमा हो जाती हैं। इनका नमी स्तर कम होने पर यह आसानी से आग पकड़ लेती हैं और जंगल में आग के तेजी से फैलने का कारण बन सकती हैं।

ऐसे में पाइन नीडल्स और अन्य सूखे वन बायोमास को जंगल से हटाकर उनका उपयोग किसी उत्पाद के निर्माण में करना दोहरा लाभ दे सकता है। इससे एक तरफ जंगल में ज्वलनशील सामग्री का भार कम होगा, वहीं दूसरी ओर इस बायोमास को उपयोगी संसाधन में बदलकर आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ हासिल किया जा सकेगा।

बायोचार क्या है?

बायोचार एक प्रकार का कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जिसे जैविक सामग्री को नियंत्रित परिस्थितियों में गर्म करके तैयार किया जाता है। जंगल से मिलने वाले बायोमास को सीधे जलाने के बजाय नियंत्रित प्रक्रिया से बायोचार में बदलने का उद्देश्य कार्बन को लंबे समय तक स्थिर रूप में रखना और जैविक अवशेषों का बेहतर उपयोग करना है।

बायोचार का इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, कार्बन को लंबे समय तक जमीन में बनाए रखने और कृषि एवं बागवानी से जुड़े विभिन्न कार्यों में किया जा सकता है। इससे जैविक कचरे के प्रबंधन और कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

रोजाना 1.5 टन बायोमास प्रोसेस करने की क्षमता

नेरी में स्थापित प्लांट की रोजाना करीब 1.5 टन बायोमास प्रोसेस करने की क्षमता है। यहां चीड़ की पत्तियों और जंगल से प्राप्त अन्य बायोमास को एकत्र कर नियंत्रित प्रक्रिया के जरिए बायोचार में बदला जाएगा।

इस तरह जंगलों से निकलने वाले ऐसे बायोमास को, जो सामान्य परिस्थितियों में आग के लिए ईंधन का काम करता है, एक उपयोगी संसाधन में बदलने की कोशिश की जा रही है। परियोजना से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू किया जाता है तो जंगलों में आग के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

कई संस्थाओं के सहयोग से तैयार हुआ प्रोजेक्ट

यह परियोजना किसी एक संस्था का प्रयास नहीं है। इसे हिमाचल प्रदेश वन विभाग, IIT रुड़की, डॉ. वाई.एस. परमार हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री यूनिवर्सिटी और प्रोक्लाइम (ProClime) के सहयोग से तैयार किया गया है।

विभिन्न संस्थाओं की विशेषज्ञता को एक साथ लाकर प्लांट को विकसित किया गया है। इसमें वन क्षेत्र से बायोमास की उपलब्धता, तकनीकी प्रक्रिया, पर्यावरणीय प्रभाव और व्यावहारिक उपयोग जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा गया है।

परियोजना का उद्देश्य केवल बायोचार का उत्पादन करना नहीं, बल्कि वन प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था विकसित करना भी है जिसे भविष्य में दूसरे क्षेत्रों में अपनाया जा सके।

हिमालयी राज्यों के लिए मॉडल बनने की उम्मीद

अधिकारियों के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में जंगल की आग की समस्या हर साल सामने आती है। ऐसे क्षेत्रों में चीड़ के जंगलों की बड़ी संख्या होने के कारण पाइन नीडल्स का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

यदि जंगलों से पाइन नीडल्स को नियमित रूप से एकत्र कर बायोचार जैसे उपयोगी उत्पाद में बदला जाए तो वन क्षेत्र में ज्वलनशील सामग्री का संचय कम किया जा सकता है। इससे आग के जोखिम को कम करने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

इस मॉडल की सफलता के बाद इसे अन्य वन क्षेत्रों में भी लागू करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां चीड़ की पत्तियां बड़ी मात्रा में जमा होती हैं और हर साल जंगल की आग का खतरा बना रहता है।

जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी मदद

परियोजना को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बायोचार कार्बन को अपेक्षाकृत स्थिर रूप में रखने का माध्यम हो सकता है। यदि जंगलों के बायोमास का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो इससे खुले में जलाने जैसी गतिविधियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

वन बायोमास का उपयोग बायोचार बनाने में करने से जैविक अवशेषों के प्रबंधन की समस्या का भी समाधान तलाशा जा सकता है। इसके अलावा बायोचार का संभावित कृषि और बागवानी उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों में भी सहायक हो सकता है।

टिकाऊ वन प्रबंधन की दिशा में कदम

नेरी में शुरू किया गया प्लांट जंगल की आग की समस्या को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय वन क्षेत्र में उपलब्ध बायोमास के वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर देता है। चीड़ की पत्तियों जैसी ज्वलनशील सामग्री को जंगल से हटाकर उसका उपयोगी उत्पाद में रूपांतरण वन प्रबंधन के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश करता है।

यदि इस परियोजना से अपेक्षित परिणाम मिलते हैं तो भविष्य में इसकी क्षमता बढ़ाई जा सकती है और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में भी ऐसे संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं। इससे जंगल की आग की रोकथाम, बायोमास प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के प्रयासों को एक साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

नेरी में शुरू हुआ 1.5 टन प्रतिदिन क्षमता वाला यह प्लांट फिलहाल एक पायलट पहल के रूप में महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में इसके संचालन से मिलने वाले अनुभव यह तय करने में मदद करेंगे कि जंगल के बायोमास से बायोचार बनाने की तकनीक को हिमालयी राज्यों में कितने बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है।

Next Story