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हिमाचल में कमजोर मानसून से बढ़ी चिंता, भाखड़ा-पौंग जैसे बांधों का जलस्तर गिरा

शिमला। हिमाचल प्रदेश में मानसून की कमजोर गतिविधियों ने न केवल राज्य बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण प्रदेश की प्रमुख नदियों पर बने बड़े बांध और जलाशय अपनी क्षमता के अनुरूप नहीं भर पाए हैं। भाखड़ा, पौंग और नाथपा झाकड़ी जैसे महत्वपूर्ण जलाशयों में जलस्तर पिछले साल की तुलना में काफी नीचे दर्ज किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो इसका सीधा असर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों पर पड़ सकता है। इन राज्यों में सिंचाई व्यवस्था के साथ-साथ बिजली उत्पादन भी प्रभावित होने की संभावना है।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, 11 अगस्त को भाखड़ा बांध का जलस्तर 492.17 मीटर दर्ज किया गया। जबकि वर्ष 2025 में इसी अवधि के दौरान यह जलस्तर 502.00 मीटर था। यानी इस साल भाखड़ा बांध का जलस्तर पिछले साल की तुलना में करीब 9.83 मीटर नीचे है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भाखड़ा जलाशय अभी अपनी अधिकतम क्षमता से लगभग 19.9 मीटर यानी करीब 65 फीट कम भरा हुआ है। जलस्तर में यह कमी आने वाले समय में जल प्रबंधन और बिजली उत्पादन के लिए चुनौती बन सकती है।
भाखड़ा बांध उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में शामिल है। इससे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा यहां से बड़ी मात्रा में जलविद्युत उत्पादन भी होता है।
कम बारिश का असर केवल भाखड़ा बांध तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश के अन्य प्रमुख जलाशयों में भी पानी की स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में कमजोर बताई जा रही है। पौंग बांध और नाथपा झाकड़ी परियोजना जैसे महत्वपूर्ण जल संसाधनों पर भी मानसून की कमी का असर देखने को मिल रहा है।
हिमाचल की नदियों में जल प्रवाह मानसून पर काफी निर्भर करता है। सतलुज, ब्यास और रावी जैसी प्रमुख नदियों में पर्याप्त पानी नहीं आने से बांधों में जल संग्रहण प्रभावित होता है। यही पानी आगे चलकर बिजली उत्पादन और कृषि जरूरतों को पूरा करने में उपयोग किया जाता है।
जल विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के अंतिम चरण में अगर अच्छी बारिश होती है तो जलाशयों की स्थिति में सुधार आ सकता है। लेकिन अगर बारिश सामान्य से कम रही तो जल संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
हिमाचल प्रदेश में इस बार मानसून की गति कई क्षेत्रों में कमजोर रही है। कई इलाकों में बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है। हालांकि कुछ स्थानों पर भारी बारिश से नुकसान भी हुआ है, लेकिन कुल मिलाकर जलाशयों को भरने के लिए जितनी बारिश की आवश्यकता थी, उतनी नहीं हो पाई है।
कम जलस्तर का सबसे बड़ा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख जलविद्युत उत्पादन राज्यों में शामिल है। यहां बनने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा उत्तर भारत के कई राज्यों को आपूर्ति किया जाता है।
अगर बांधों में पानी कम रहा तो बिजली उत्पादन घट सकता है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर गर्मी के मौसम में बिजली की मांग अधिक रहने के कारण यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
इसके अलावा पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्यों में सिंचाई के लिए भी इन बांधों का पानी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जलाशयों में पानी कम होने से रबी और अन्य फसलों की सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी जल संसाधनों पर इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि राजधानी की जल आपूर्ति कई स्रोतों पर निर्भर करती है, लेकिन उत्तर भारत की समग्र जल स्थिति पर बांधों के जलस्तर का असर पड़ता है।
प्रशासन और जल प्रबंधन विभाग स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जल उपलब्धता और बांधों के संचालन को लेकर लगातार समीक्षा की जा रही है।
मानसून के शेष दिनों में बारिश की उम्मीद अभी बनी हुई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, आने वाले समय में कुछ क्षेत्रों में बारिश हो सकती है। अगर अच्छी बारिश होती है तो बांधों के जलस्तर में सुधार की संभावना है।
हिमाचल प्रदेश के लिए मानसून केवल बारिश का मौसम नहीं बल्कि राज्य और पूरे उत्तर भारत की जल और ऊर्जा व्यवस्था का आधार है। ऐसे में बांधों का कम जलस्तर भविष्य की तैयारियों को लेकर चिंता बढ़ा रहा है।
फिलहाल प्रशासन की नजर मानसून की गतिविधियों पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में होने वाली बारिश यह तय करेगी कि जलाशयों की स्थिति में कितना सुधार आता है और उत्तर भारत के राज्यों पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।





