हिमाचल प्रदेश

रेवालसर में दिखती तीन धार्मिक परंपराओं की झलक

Kiran
14 Sept 2026 1:25 PM IST
रेवालसर में दिखती तीन धार्मिक परंपराओं की झलक
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Himachal Pradesh हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों के बीच बसा मंडी ज़िले का छोटा सा शहर रेवालसर, अपनी प्राकृतिक सुंदरता से कहीं ज़्यादा चीज़ों के लिए पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। बौद्ध, हिंदू और सिख धर्म के लोगों के लिए पवित्र यह शहर — जिसे तिब्बती बौद्ध 'त्सो पेमा' या 'कमल झील' के नाम से जानते हैं — आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के लिए एक खास जगह बन गया है। रेवालसर के बीचों-बीच इसकी पवित्र झील है, जिसके चारों ओर तीन धर्मों के पूजा-स्थल बने हैं। शांत पानी, प्रार्थना के झंडे, मंदिर, मठ और गुरुद्वारा मिलकर एक ऐसा नज़ारा बनाते हैं जो शहर की सदियों पुरानी धार्मिक भाईचारे की परंपरा को दिखाता है।
बौद्ध धर्म के लोगों के लिए, रेवालसर का महत्व पद्मसंभव (जिन्हें गुरु रिम्पोछे भी कहा जाता है) के जीवन से जुड़ा है। माना जाता है कि 8वीं सदी के इस भारतीय योगी ने तिब्बत जाने से पहले यहाँ रहकर ध्यान किया था; तिब्बत में उन्होंने बौद्ध धर्म को फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी। झील के पास बनी पद्मसंभव की विशाल प्रतिमा रेवालसर की सबसे खास जगहों में से एक बन गई है और तीर्थयात्रियों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। हिंदू परंपरा में भी इस शहर का बहुत महत्व है। स्थानीय लोग इसे 'त्रिसंगम' कहते हैं और रेवालसर का संबंध ऋषि लोमश से है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने यहाँ ध्यान किया था। भगवान शिव, भगवान कृष्ण और ऋषि लोमश को समर्पित मंदिर शहर के धार्मिक महत्व को और बढ़ाते हैं, जिससे साल भर श्रद्धालु यहाँ आते रहते हैं।
सिख तीर्थयात्री भी झील के किनारे बने ऐतिहासिक गुरुद्वारे में मत्था टेकने रेवालसर आते हैं। यह गुरुद्वारा सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह की यात्रा की याद दिलाता है और शहर की मिली-जुली धार्मिक विरासत की एक और अहम कड़ी है। रेवालसर की प्राकृतिक सुंदरता में झील पर तैरते अनोखे द्वीप और भी चार चाँद लगाते हैं। नरकट और वनस्पतियों के झुंड से बनी ये तैरती हुई आकृतियाँ पानी पर इधर-उधर घूमती रहती हैं, जिससे पर्यटकों को एक दुर्लभ प्राकृतिक नज़ारा देखने को मिलता है और झील की खूबसूरती और बढ़ जाती है।
धार्मिक त्योहारों के दौरान यह शहर जीवंत हो उठता है। सालाना 'त्सेचु' त्योहार में लद्दाख, लाहौल-स्पीति और ज़ंस्कार समेत हिमालयी क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों से बौद्ध श्रद्धालु आते हैं। ऐसे आयोजनों से रेवालसर प्रार्थना, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक जीवंत केंद्र बन जाता है। सड़क संपर्क बेहतर होने से रेवालसर की यात्रा पर्यटकों के लिए आसान और आरामदायक हो गई है। यहाँ साल भर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का आना-जाना लगा रहता है, जो न सिर्फ़ धार्मिक अनुभव की तलाश में आते हैं, बल्कि आस-पास की पहाड़ियों के बीच शांति भी महसूस करना चाहते हैं।
यात्रियों के लिए रेवालसर कुछ खास पेश करता है: हिमालय के एक छोटे से इलाके में तीन प्रमुख धार्मिक परंपराओं को अनुभव करने का मौका। यहाँ एक पवित्र झील के आस-पास मंदिर, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ एक साथ मौजूद हैं, जो इस शहर को भारत की मिली-जुली सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता उदाहरण बनाते हैं। जैसे-जैसे आध्यात्मिक पर्यटन लोकप्रिय हो रहा है, रेवालसर का आकर्षण आस्था, इतिहास, प्रकृति और सद्भाव के इस अनोखे मेल में छिपा है — जो 'त्सो पेमा' या 'त्रिसंगम' को एक ऐसी जगह बनाता है जहाँ की यात्रा पहाड़ों के पार जाने के साथ-साथ मन के भीतर की यात्रा भी होती है।
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