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हिमाचल प्रदेश
नेपाल के 49 अधिकारियों और किसानों को मिला बागवानी का प्रशिक्षण
Kiran
19 Oct 2026 2:37 PM IST

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नौनी स्थित डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय (UHF) ने नेपाल के कृषि विस्तार अधिकारियों और किसानों के लिए बागवानी फसलों की वैज्ञानिक खेती और प्रबंधन पर दस दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा किया है। इससे दोनों देशों के बीच कृषि सहयोग और मजबूत हुआ है। इस कार्यक्रम में नेपाल के सात प्रांतों के 44 अधिकारियों और पांच प्रगतिशील किसानों सहित कुल 49 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
भारत और नेपाल के विदेश मंत्रालयों के बीच सहयोग के तहत, नेपाल से आए प्रशिक्षुओं का यह तीसरा बैच था। इस पहल का उद्देश्य तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना, वैज्ञानिक खेती के तरीकों को बढ़ावा देना और बागवानी तथा उससे जुड़े कृषि क्षेत्रों में ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत करना है।
इस प्रशिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों को आधुनिक बागवानी तकनीकों और विविध कृषि उद्यमों की समझ मिली। इसमें मुख्य रूप से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब और अखरोट की वैज्ञानिक खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, व्यावसायिक फूल उत्पादन और प्राकृतिक खेती पर ध्यान केंद्रित किया गया। कक्षा में दिए गए व्याख्यानों, व्यावहारिक प्रदर्शनों, फील्ड दौरों और आपसी चर्चाओं के जरिए प्रतिभागियों को व्यावहारिक अनुभव मिला। साथ ही, उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान खोजने में भी मदद मिली।
समापन समारोह में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए, कुलपति प्रो. एच.एस. बवेजा ने भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चली आ रही साझेदारी का जिक्र किया। उन्होंने तकनीकी आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण की पहलों के जरिए कृषि सहयोग को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाने से कृषि उत्पादकता में सुधार हो सकता है, उपज की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है और किसानों की आय बढ़ सकती है।
विविध कृषि प्रणालियों के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में मधुमक्खी पालन की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए, प्रो. बवेजा ने मधुमक्खी से मिलने वाले उत्पादों, जैसे रॉयल जेली, बी पॉलेन (मधुमक्खी पराग) और बी वेनम (मधुमक्खी का विष) के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने प्रतिभागियों को 'एपिएथेरेपी' (मधुमक्खी उत्पादों से उपचार) की अवधारणा और इसके संभावित उपयोगों से भी परिचित कराया। उन्होंने प्रतिभागियों को कृषि विविधीकरण, उद्यम विकास और आय सृजन के एक बेहतरीन विकल्प के रूप में 'नट' (सूखे मेवे वाली) फसलों की संभावनाओं को तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया। विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. डी.पी. शर्मा ने कृषि उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने के लिए फलों की खेती में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों के बीच आधुनिक बागवानी तकनीकों का प्रभावी प्रसार रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है, उद्यमिता को बढ़ावा दे सकता है और ग्रामीण आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है।
इस कार्यक्रम के तहत, प्रतिभागियों ने मशोबरा स्थित क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, कंडाघाट स्थित कृषि विज्ञान केंद्र और सोलन स्थित मशरूम अनुसंधान निदेशालय का दौरा किया। इन दौरों से उन्नत उत्पादन तकनीकों, चल रही शोध पहलों और वास्तविक परिस्थितियों में वैज्ञानिक नवाचारों के अनुप्रयोग के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिली। प्रतिभागियों ने कार्यक्रम आयोजित करने के लिए विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना की और विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों तथा वैज्ञानिकों द्वारा प्रदान किए गए तकनीकी मार्गदर्शन, व्यावहारिक अनुभव और सहयोग को सराहा।
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