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हिमाचल में 38 हजार करोड़ की फोरलेन परियोजनाओं पर संकट, NHAI ने मुख्य सचिव से मांगा हस्तक्षेप

शिमला। हिमाचल प्रदेश में करीब 38 हजार करोड़ रुपये की फोरलेन परियोजनाओं के निर्माण में आ रही बाधाओं को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। एनएचएआई के निदेशक संतोष कुमार यादव ने मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत को पत्र लिखकर तीन प्रमुख मुद्दों के समाधान का आग्रह किया है। इनमें 28 किलोमीटर लंबे शिमला बाईपास के निर्माण के दौरान निकलने वाले मलबे की डंपिंग से जुड़ी समस्या प्रमुख है। स्थानीय ग्रामीणों के विरोध के कारण निर्माण स्थल से निकलने वाले मलबे को निर्धारित स्थान पर पहुंचाने में परेशानी हो रही है।
एनएचएआई ने मुख्य सचिव से व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर समस्याओं का समाधान कराने का अनुरोध किया है। पत्र में बताया गया है कि शिमला बाईपास के निर्माण के लिए वन भूमि के डायवर्जन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन सुरंग निर्माण और पहाड़ों की कटिंग से निकलने वाले मलबे के निस्तारण में कठिनाइयां बनी हुई हैं। शुंगल गांव के स्थानीय लोग निर्धारित डंपिंग साइट तक पहुंचने के लिए एक्सेस रोड का इस्तेमाल नहीं करने दे रहे हैं।
38 हजार करोड़ की परियोजनाओं में अड़चन
हिमाचल प्रदेश में करीब 38 हजार करोड़ रुपये की फोरलेन परियोजनाओं से जुड़े निर्माण कार्यों में विभिन्न बाधाएं सामने आई हैं।
इन समस्याओं को लेकर एनएचएआई के निदेशक संतोष कुमार यादव ने मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत को पत्र लिखा है।
पत्र में तीन मुद्दों पर व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने का आग्रह किया गया है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में तीनों मुद्दों का पूरा विवरण नहीं दिया गया है।
शिमला बाईपास के मलबा निस्तारण से संबंधित समस्या का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
एनएचएआई का यह पत्र निर्माण कार्यों में आ रही बाधाओं को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने की आवश्यकता को सामने लाता है।
28 किलोमीटर लंबे शिमला बाईपास में परेशानी
शिमला बाईपास की कुल लंबाई 28 किलोमीटर बताई गई है।
इस परियोजना के निर्माण में सुरंग और पहाड़ों की कटिंग से बड़ी मात्रा में मलबा निकलना है।
निर्माण कार्य के दौरान इस मलबे को निर्धारित स्थानों पर पहुंचाना आवश्यक है।
लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के विरोध के कारण डंपिंग की व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
एनएचएआई ने इसी समस्या को मुख्य सचिव के समक्ष उठाया है।
हालांकि, विरोध के कारण निर्माण कार्य कितने दिनों से प्रभावित है और परियोजना की समयसीमा पर कितना असर पड़ा है, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
शुंगल गांव में डंपिंग का विरोध
शिमला बाईपास परियोजना के अंतर्गत शुंगल गांव में मलबा डालने के लिए डंपिंग साइट निर्धारित की गई है।
इस स्थल का क्षेत्रफल करीब 1.4 हेक्टेयर है।
एनएचएआई के अनुसार, स्थानीय लोग डंपिंग साइट तक पहुंचने वाले एक्सेस रोड का उपयोग नहीं करने दे रहे हैं।
इसके कारण निर्माण कार्य से निकलने वाले मलबे को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने में परेशानी हो रही है।
हालांकि, ग्रामीणों के विरोध के पीछे क्या कारण हैं, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
स्थानीय लोगों की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान भी उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।
छह लाख घन मीटर मलबा डालने की योजना
शुंगल गांव की निर्धारित डंपिंग साइट में करीब छह लाख घन मीटर मलबा डाला जाना प्रस्तावित है।
यह मलबा शिमला बाईपास के निर्माण कार्यों से संबंधित है।
सुरंग निर्माण और पहाड़ों की कटिंग के दौरान निकलने वाली सामग्री के सुरक्षित निस्तारण के लिए उपयुक्त स्थान की आवश्यकता होती है।
एनएचएआई के सामने इसी सामग्री को निर्धारित डंपिंग स्थल तक पहुंचाने की चुनौती है।
स्थानीय विरोध के कारण एक्सेस रोड का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
हालांकि, डंपिंग साइट की तकनीकी क्षमता, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और वहां मलबा डालने की स्वीकृत शर्तों का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं है।
40.3 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन पूरा
शिमला बाईपास परियोजना के लिए 40.3 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हो चुका है।
इससे परियोजना से संबंधित वन भूमि के उपयोग की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया पूरी होने की जानकारी सामने आई है।
इसके बावजूद निर्माण कार्य में मलबा निस्तारण की समस्या बनी हुई है।
वन भूमि का डायवर्जन और निर्माण के दौरान निकलने वाले मलबे का निस्तारण अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
वन भूमि से जुड़ी स्वीकृति मिलने के बाद भी निर्माण सामग्री और मलबे के प्रबंधन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं करनी होती हैं।
शिमला बाईपास परियोजना में फिलहाल यही समस्या प्रमुख बाधा के रूप में सामने आई है।
सुरंग और कटिंग से निकल रहा मलबा
पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण के दौरान सुरंग बनाने और पहाड़ों की कटिंग करने से बड़ी मात्रा में मलबा निकलता है।
इस सामग्री को सुरक्षित और निर्धारित स्थान पर पहुंचाना निर्माण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शिमला बाईपास परियोजना में भी सुरंग और कटिंग से निकलने वाले मलबे के निस्तारण की व्यवस्था करनी है।
हालांकि, परियोजना में कुल कितनी सुरंगें प्रस्तावित हैं और अब तक कितना मलबा निकाला जा चुका है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
एनएचएआई ने मुख्य सचिव को भेजे पत्र में डंपिंग से जुड़ी बाधाओं को प्रमुखता से उठाया है।
डीडीएमए को दी गई हैं शक्तियां
मलबा हटाने से संबंधित समस्याओं को देखते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) को शक्तियां प्रदान की हैं।
इसके बावजूद शिमला बाईपास के निर्माण स्थल पर विरोध जारी है।
एनएचएआई के पत्र से स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव के बाद भी स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
हालांकि, डीडीएमए को दी गई शक्तियों की विस्तृत कानूनी शर्तें और उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं हैं।
इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि संबंधित प्राधिकरण ने इस मामले में अब तक कौन-सी विशिष्ट कार्रवाई की है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग
एनएचएआई के निदेशक संतोष कुमार यादव ने मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत से व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध किया है।
पत्र में निर्माण कार्यों से जुड़ी समस्याओं का समाधान कराने की आवश्यकता बताई गई है।
शिमला बाईपास के मामले में स्थानीय विरोध और डंपिंग स्थल तक पहुंच की समस्या प्रमुख है।
इस समस्या का समाधान होने पर मलबे को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
हालांकि, मुख्य सचिव की ओर से पत्र पर क्या कार्रवाई की गई है, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।
स्थानीय विरोध बना बड़ी चुनौती
शुंगल गांव के ग्रामीणों द्वारा एक्सेस रोड का इस्तेमाल रोकना परियोजना के लिए महत्वपूर्ण बाधा बन गया है।
निर्धारित डंपिंग साइट तक मलबा पहुंचाने के लिए रास्ते की उपलब्धता आवश्यक है।
यदि निर्माण सामग्री और मलबे का आवागमन प्रभावित होता है, तो संबंधित निर्माण गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, ग्रामीणों ने किन मांगों को लेकर विरोध किया है, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में स्थानीय लोगों की आपत्तियों के संबंध में कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
समस्या के समाधान के लिए संबंधित विभागों और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक समन्वय महत्वपूर्ण हो सकता है।
पहाड़ी क्षेत्रों में मलबा प्रबंधन जरूरी
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में सड़क और सुरंग निर्माण के दौरान मलबा प्रबंधन विशेष महत्व रखता है।
निर्माण से निकलने वाली सामग्री को निर्धारित स्थानों पर सुरक्षित तरीके से रखना आवश्यक होता है।
अनियंत्रित डंपिंग से पर्यावरण और आसपास के क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए निर्माण कार्यों में मलबे के निस्तारण की योजना और सुरक्षा मानकों का पालन महत्वपूर्ण है।
हालांकि, शुंगल गांव की डंपिंग साइट से किसी पर्यावरणीय नुकसान की पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं की गई है।
इस मामले में फिलहाल स्थानीय विरोध और रास्ते के उपयोग को लेकर विवाद की जानकारी सामने आई है।
परियोजना की प्रगति पर रहेगी नजर
करीब 38 हजार करोड़ रुपये की फोरलेन परियोजनाओं में आ रही बाधाओं को लेकर एनएचएआई का मुख्य सचिव को पत्र लिखना महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
विशेष रूप से 28 किलोमीटर लंबे शिमला बाईपास में मलबा निस्तारण की समस्या सामने आई है।
परियोजना के लिए 40.3 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन पूरा होने के बावजूद डंपिंग स्थल तक पहुंच की बाधा बनी हुई है।
शुंगल गांव की 1.4 हेक्टेयर डंपिंग साइट में छह लाख घन मीटर मलबा डालने की योजना है, लेकिन ग्रामीणों के विरोध से समस्या बनी हुई है।
अब मुख्य सचिव के स्तर पर होने वाली कार्रवाई और स्थानीय विवाद के समाधान पर परियोजना की आगे की प्रगति निर्भर करेगी।





