
हरियाणा Haryana: फरवरी 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा के रोहतक में हुई भीषण हिंसा और आगजनी की घटना, जिसे अक्सर "जब रोहतक जल गया" के रूप में याद किया जाता है, एक दशक के करीब पहुँचने के बाद भी स्थानीय समाज और अर्थव्यवस्था के लिए एक गहरा नासूर बनी हुई है। इस हिंसा ने न केवल शहर को भौतिक रूप से नुकसान पहुँचाया, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी गहरा जख्म दिया है।
हिंसा और क्षति (2016 का मंजर):
व्यापक विनाश: 9-10 दिनों तक चले इस आंदोलन के दौरान रोहतक मुख्य केंद्र था। आगजनी और हिंसा में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट हो गई थी।
लक्षित हमले: मुख्य रूप से गैर-जाटों के ऑटोमोबाइल शोरूम, दुकान, होटल और रिहायशी मकानों को घुमाकर जलाया और लूटा गया।
मानवीय क्षति: हिंसा के कारण 30 से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए। एक दशक बाद के गहरे जख्म: सामाजिक अविश्वास: सबसे गहरा असर जातियों के बीच आपसी विश्वास पर पड़ा है। जाट और गैर-जाट जातियों के बीच की खाई आज भी महसूस की जाती है, जिसे अक्सर "बंटवारा" कहा जाता है। आर्थिक नुकसान का दंश: कई मजदूरों ने कहा कि उनके द्वारा पुनर्निर्माण के बाद भी वह रौनक वापस नहीं आई है। व्यवसाय को हुए नुकसान की भरपाई करना कठिन था, और डर अभी भी बना हुआ है। राजनीतिक नफा-नुकसान: 2016 की हिंसा का असर बाद के सभी चुनावों में दिखा है, जहां जातियों जाटों और गैर-जाटों के बीच संतुलन बनाने में बढ़ती रही। मनोवैज्ञानिक डर: जिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने अपना घर और दुकान जलते हुए देखा, उनके लिए वह समय आज भी एक डरावना सपना है, जिसने शहर की शांति को स्थायी रूप से बदल दिया है।





