हरियाणा

हौसले की मिसाल हैं रोहतक की शालू, संवार रहीं जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी

nidhi
11 Oct 2026 10:11 AM IST
हौसले की मिसाल हैं रोहतक की शालू, संवार रहीं जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी
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पोलियो से संघर्ष

रोहतक : हर इंसान की जिंदगी में चुनौतियां आती हैं, लेकिन कुछ लोग मुश्किल परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने देते। हरियाणा के रोहतक की शालू की कहानी भी हिम्मत, आत्मविश्वास और दूसरों के लिए कुछ करने के जज्बे की मिसाल है। महज तीन साल की उम्र में पोलियो होने के बाद उनकी जिंदगी में दिव्यांगता की चुनौती आई, लेकिन उन्होंने इसके सामने हार नहीं मानी। आज वह जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने के प्रयासों से दूसरों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।

शालू की कहानी इस बात का संदेश देती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां किसी व्यक्ति की क्षमताओं और उसके सपनों की अंतिम सीमा तय नहीं करतीं। दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच के साथ व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के बीच भी आगे बढ़ने का रास्ता तलाश सकता है।
तीन साल की उम्र में पोलियो ने बदली जिंदगी
शालू को महज तीन साल की उम्र में पोलियो हो गया था। इतनी कम उम्र में इस बीमारी का सामना करना और उसके साथ जीवन बिताना आसान नहीं रहा होगा। पोलियो के कारण होने वाली शारीरिक दिव्यांगता व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में परिवार, समाज और आसपास के लोगों का सहयोग भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
शालू ने अपनी दिव्यांगता को अपनी पहचान का एकमात्र हिस्सा नहीं बनने दिया। उनकी कहानी इस बात को रेखांकित करती है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके विचारों, काम और जीवन के प्रति नजरिए से भी बनती है। दिव्यांगता के साथ जीवन जीने वाले लोगों को कई बार रोजमर्रा के कामों, आवागमन और सामाजिक व्यवहार में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना और अपनी क्षमताओं पर भरोसा बनाए रखना खास महत्व रखता है। शालू की यात्रा इसी हौसले का उदाहरण है। उन्होंने अपनी परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ने का रास्ता चुना और आज जरूरतमंद बच्चों के लिए काम कर रही हैं।
अपनी चुनौती को बनाया दूसरों की मदद का संकल्प
शालू की कहानी का अहम पहलू उनका जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए काम करना है। अपनी कठिनाइयों के बावजूद दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास अपने आप में महत्वपूर्ण है।
बच्चों को बेहतर अवसर देना किसी भी समाज के भविष्य को मजबूत करने का एक रास्ता है। जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा, मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और सहयोग मिले, तो वे अपनी क्षमताओं को पहचानकर आगे बढ़ सकते हैं। ऐसे प्रयास बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करने और उनके सामने उपलब्ध संभावनाओं को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। शालू का काम इसी व्यापक मानवीय भावना की ओर ध्यान खींचता है। वह अपने प्रयासों के माध्यम से यह संदेश देती हैं कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल बड़ी सुविधाएं या संसाधन ही जरूरी नहीं हैं, बल्कि दूसरों की मदद करने की इच्छाशक्ति भी मायने रखती है। उनके प्रयासों से जुड़े बच्चों की संख्या, उनके काम का सटीक स्वरूप और किसी संस्था से जुड़ाव के बारे में उपलब्ध जानकारी में विस्तृत विवरण नहीं है। इसलिए उनके योगदान का आकलन उन्हीं तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए जो स्पष्ट रूप से सामने आए हैं।
दिव्यांगता नहीं, हौसला बन सकता है पहचान
शालू की कहानी दिव्यांगता को लेकर समाज में प्रचलित धारणाओं पर भी ध्यान दिलाती है। किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति देखकर उसकी क्षमता या भविष्य का अनुमान लगाना उचित नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं और उसकी आवश्यकताएं भी अलग हो सकती हैं। दिव्यांग लोगों को आगे बढ़ने के लिए सुलभ वातावरण, समान अवसर और सम्मानजनक व्यवहार की जरूरत होती है। शिक्षा संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर सुविधाएं उपलब्ध हों, तो वे अधिक स्वतंत्रता के साथ अपनी क्षमता का उपयोग कर सकते हैं।
शालू की यात्रा से यह प्रेरणा मिलती है कि किसी चुनौती के सामने व्यक्ति की पहचान केवल उसकी परेशानी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसके हुनर, आत्मविश्वास और समाज के लिए किए जाने वाले कामों को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए। दिव्यांगता के साथ जीवन जीने वाले लोगों की उपलब्धियों को सामने लाना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इससे दूसरे लोगों को अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने और अवसरों की तलाश करने की प्रेरणा मिल सकती है।
जरूरतमंद बच्चों की मदद से जुड़ा बड़ा संदेश
बच्चों का जीवन संवारने के लिए सहयोग, संवेदनशीलता और लगातार प्रयास की जरूरत होती है। कई जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाई जारी रखने, सही मार्गदर्शन पाने और अपनी प्रतिभा विकसित करने में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में समाज के जिम्मेदार लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
शालू का जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करना इसी भावना को सामने लाता है। उनका उदाहरण बताता है कि अपनी जिंदगी की चुनौतियों के बीच भी दूसरों के लिए सकारात्मक भूमिका निभाने का रास्ता चुना जा सकता है। समाज में ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित करने के साथ यह भी जरूरी है कि जरूरतमंद बच्चों को सहायता देते समय उनकी गरिमा, सुरक्षा और व्यक्तिगत जरूरतों का ध्यान रखा जाए। बच्चों को केवल सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा और सपनों वाले नागरिक के रूप में देखना चाहिए।
रोहतक की शालू की कहानी से मिलती है प्रेरणा
तीन साल की उम्र में पोलियो होने के बाद जीवन की चुनौतियों का सामना करना और फिर जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए काम करना शालू की यात्रा के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि मुश्किल परिस्थितियां किसी व्यक्ति के जीवन की पूरी कहानी नहीं होतीं।
हौसला, आत्मविश्वास और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों से आगे सोचने की प्रेरणा दे सकती है। शालू का उदाहरण इसी बात को सामने रखता है कि अपने अनुभवों के बावजूद दूसरों के लिए उपयोगी काम करना भी जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है। रोहतक की शालू की कहानी का संदेश स्पष्ट है—व्यक्ति की पहचान उसकी चुनौतियों से ही तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि वह अपने जीवन और समाज के लिए क्या प्रयास करता है।

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