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Haryana हरियाणा के लोकायुक्त जस्टिस हरि पाल वर्मा (रिटायर्ड) ने विस्तार से बताया है कि कैसे 434.02 करोड़ रुपये के घोटाले को मौजूदा और रिटायर्ड नौकरशाहों ने "चुपचाप दबा दिया"। इन अधिकारियों ने या तो अपनी ड्यूटी नहीं निभाई या फिर डिफॉल्टर कंपनी के साथ मिलीभगत की। मुख्यमंत्री को (सीलबंद लिफ़ाफ़े में) भेजी गई अपनी रिपोर्ट में लोकायुक्त ने कहा कि दो मुख्य सचिवों - टीवीएसएन प्रसाद (जो 31 अक्टूबर, 2024 को रिटायर हुए) और अनुराग रस्तोगी - ने कई बार अनुरोध करने के बावजूद घोटाले से जुड़ी कार्यवाही में उनकी मदद नहीं की। उन्होंने कहा कि "इस मामले को CBI को सौंपने की ज़रूरत है"।
जस्टिस वर्मा ने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से सिफारिश की कि उन दोषी अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए जिन्होंने फर्म के साथ मिलीभगत की और बकाया रकम वसूलने में नाकाम रहे, साथ ही फर्म से 434.02 करोड़ रुपये की वसूली भी की जाए। अपनी रिपोर्ट में लोकायुक्त ने हरियाणा सिविल सेवा के अधिकारियों - मुकेश सोलंकी, मुकुल कुमार, मनोज खत्री और नरेंद्र यादव - को घोटाले के लिए "पूरी तरह ज़िम्मेदार" ठहराया। ये सभी अधिकारी गुरुग्राम में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) में एस्टेट ऑफिसर के पद पर रह चुके थे। इन्हीं अधिकारियों को 2011 में खत्म हुई कंपनी की बैंक गारंटी को रिन्यू न कराने के लिए भी ज़िम्मेदार ठहराया गया।
IAS अधिकारी नितिन यादव, प्रवीण कुमार और पीसी मीना, जिन्होंने अलग-अलग समय पर गुरुग्राम में HUDA/HSVP के एडमिनिस्ट्रेटर के तौर पर काम किया, पर "निगरानी में कमी" का आरोप लगाया गया है।
लोकायुक्त ने अपनी कड़ी टिप्पणी में कहा, "ऐसा लगता है कि सिर्फ़ HSVP अधिकारी ही लीज़ी (पट्टेदार) के साथ मिले हुए नहीं थे; बल्कि तत्कालीन मुख्य सचिव ने भी बहुत चालाकी से स्टेट विजिलेंस ब्यूरो की रिपोर्ट को कमज़ोर कर दिया और उसे टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी को भेज दिया।" इस घोटाले के काम करने के तरीके के बारे में बताते हुए, जस्टिस वर्मा ने कहा कि कैसे टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट (HSVP इसी डिपार्टमेंट के तहत आता है) के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी ने आरोपी अधिकारियों को क्लीन चिट देने के लिए "बहुत जूनियर अधिकारियों" की एक कमेटी बनाकर एक संभावित जांचकर्ता की रिपोर्ट को कमज़ोर कर दिया।
यह कहानी 2007 की है जब HSVP ने पहली बार गुरुग्राम के सेक्टर 29 में अपनी 5.66 एकड़ ज़मीन को लीज़ पर देने के लिए बोलियां मंगवाई थीं। GINC ने बोली जीती और इसे 15 साल के लिए 36 लाख रुपये प्रति महीने के किराए पर लिया। कंपनी ने शुरू से ही किराया देने में चूक की, हालांकि चूक का पहला नोटिस जून 2011 में जारी किया गया था। जून 2022 तक, किराया और ब्याज 107.15 करोड़ रुपये तक पहुंच गया; रिकवरी नोटिस जारी किया गया। एक सर्वे से पता चला कि कंपनी ने 1.34 एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था, और GINC को अनधिकृत कब्ज़े के लिए 114.15 करोड़ रुपये की मांग वाला नोटिस भेजा गया। जब कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया, तो जुलाई 2022 में लीज़ रद्द कर दी गई और 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
यह भी पता चला कि 40 करोड़ रुपये का बैंक लोन लेने के लिए लीज़होल्ड अधिकारों को गिरवी रखने की NOC और अनुमति GINC को 23 मार्च 2009 को दी गई थी, और समझौते में ऐसी कोई शर्त न होने के बावजूद, एक ही दिन में यह अधिकार सात से आठ बार दूसरों को ट्रांसफर किए गए। इसके अलावा, लीज़ लेने वाली कंपनी ने जुलाई 2014 में HSVP को 3.92 करोड़ रुपये का चेक दिया था, लेकिन वह बाउंस हो गया। HSVP ने चेक-बाउंस का केस दर्ज किया, लेकिन मामला लोक अदालत में ले जाया गया, जहां समझौता हो गया। न तो पैसे का भुगतान किया गया और न ही HSVP ने शिकायत को आगे बढ़ाया।
खास बात यह है कि लोकायुक्त ने पाया कि स्टेट विजिलेंस ब्यूरो ने 2015 में ही कंपनी की गड़बड़ियों का पता लगा लिया था, और वह भी तत्कालीन मुख्यमंत्री ML Khattar से मिले एक नोट के आधार पर। स्टेट विजिलेंस चीफ प्रभात रंजन देव ने 2017 में तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी डीएस ढेसी को एक रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें तत्कालीन एडमिनिस्ट्रेटर टीके शर्मा की अगुवाई वाली पूरी HSVP कमेटी पर GINC को "अनुचित लाभ" पहुंचाने का आरोप लगाया गया था।
लोकायुक्त ने कहा कि देव ने पाया था कि यह प्रोजेक्ट बिना किसी ज़रूरत या मांग के शुरू किया गया था और टेंडर की शर्तें GINC के लिए "खास तौर पर तैयार" की गई थीं। विदेशी कंपनियों को आवेदन करने से रोक दिया गया था। इसके अलावा, 2011 से 2016 के बीच किराया वसूलने के लिए नौ नोटिस जारी किए गए, लेकिन लीज़ रद्द करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई। लोकायुक्त के अनुसार, "यह सवाल उठता है कि तत्कालीन CA/HUDA टीसी गुप्ता (IAS) ने 29 अगस्त 2007 को खुद से (suo motu) इस प्रोजेक्ट को शुरू करने का प्रस्ताव क्यों रखा। इससे पहले से तय फैसले का संकेत मिलता है... फिर उस फैसले तक पहुंचने के लिए फाइलों पर कागजी कार्रवाई शुरू हुई... सरकार गुप्ता से इस पर राय मांग सकती है।" हरियाणा सरकार की वेबसाइट पर 'किंगडम ऑफ ड्रीम्स' को अभी भी एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन के तौर पर दिखाया गया है, जबकि यह जगह 2022 से बंद पड़ी है।
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