हरियाणा
डिजिटल अरेस्ट का बड़ा खेल, दंपती से 1.89 करोड़ रुपये की ठगी, दो आरोपी गिरफ्तार
Rajeshwari Nishad
2 Nov 2026 5:57 PM IST

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रेवाड़ी: हरियाणा के रेवाड़ी जिले में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर एक दंपति से 1.89 करोड़ रुपये की साइबर ठगी के मामले में पुलिस को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। धारूहेड़ा के सेक्टर छह में रहने वाले दंपति को साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर बड़ी रकम ठग ली थी। इस मामले की जांच के दौरान पुलिस ने दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के बाद मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका और ठगी की रकम के लेनदेन से जुड़े पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी के मामले देश के विभिन्न हिस्सों में सामने आ रहे हैं। इनमें साइबर अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं। रेवाड़ी का यह मामला भी साइबर अपराध के गंभीर आर्थिक नुकसान को दर्शाता है।
धारूहेड़ा के दंपति को बनाया निशाना
प्राप्त जानकारी के अनुसार, धारूहेड़ा के सेक्टर छह में रहने वाला एक दंपति साइबर ठगों के जाल में फंस गया था। आरोप है कि अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर दंपति से कुल 1 करोड़ 89 लाख रुपये की ठगी की।इतनी बड़ी रकम की धोखाधड़ी सामने आने के बाद मामला गंभीर हो गया। पीड़ित दंपति ने संबंधित पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, जिसके आधार पर जांच शुरू हुई।इस मामले में पुलिस ने अब दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया है।हालांकि, उपलब्ध प्रारंभिक जानकारी में गिरफ्तार आरोपियों के नाम, उनकी गिरफ्तारी के स्थान और उनकी कथित भूमिका का विस्तृत विवरण स्पष्ट नहीं है।इन तथ्यों की पुष्टि पुलिस की आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही की जा सकती है।
डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर की गई ठगी
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक तरीका है, जिसमें अपराधी किसी व्यक्ति को झूठे कानूनी मामले में फंसाने का डर दिखाते हैं।अपराधी अक्सर फोन कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क करते हैं। वे खुद को किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हैं और पीड़ित को विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि उसके खिलाफ गंभीर जांच चल रही है।कई मामलों में फर्जी पहचान पत्र, सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि और नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल भी किया जाता है।इसके बाद पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रहने, किसी से संपर्क नहीं करने और रकम ट्रांसफर करने का दबाव दिया जाता है।हालांकि, रेवाड़ी के इस विशेष मामले में ठगों ने कौन-सी एजेंसी का नाम इस्तेमाल किया और किस तरह रकम ट्रांसफर कराई, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
दो और आरोपियों की गिरफ्तारी से जांच को मिलेगी मदद
पुलिस ने मामले में दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इससे साइबर ठगी से जुड़े संभावित नेटवर्क की जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।ऐसे मामलों में पुलिस के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण होता है कि ठगी की रकम किन बैंक खातों में भेजी गई और उसके बाद उसका इस्तेमाल कैसे किया गया।साइबर अपराधों में कई बार अलग-अलग व्यक्तियों की भूमिकाएं होती हैं। कोई व्यक्ति फर्जी कॉल करने में शामिल होता है, तो कोई बैंक खाते उपलब्ध कराता है या रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजने में भूमिका निभाता है।हालांकि, गिरफ्तार दोनों आरोपियों की वास्तविक भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।पुलिस को उपलब्ध बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल उपकरणों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले की कड़ियां जोड़नी होंगी।
1.89 करोड़ रुपये की रकम का पता लगाना बड़ी चुनौती
इस मामले में ठगी गई रकम 1.89 करोड़ रुपये बताई गई है। इतनी बड़ी राशि की धोखाधड़ी के बाद पैसे की बरामदगी और लेनदेन की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।साइबर अपराधों में ठगी की रकम को कई खातों में स्थानांतरित किए जाने की आशंका रहती है।ऐसी स्थिति में बैंक खातों के रिकॉर्ड, ट्रांजेक्शन विवरण और संबंधित डिजिटल साक्ष्य जांच में उपयोगी हो सकते हैं।यदि ठगी की रकम का कोई हिस्सा खातों में उपलब्ध मिलता है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उसे सुरक्षित करने के प्रयास किए जा सकते हैं।हालांकि, रेवाड़ी के मामले में अब तक कितनी रकम बरामद या फ्रीज की गई है, इसकी पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं
साइबर सुरक्षा के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कानून में फोन या वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट करने की कोई मान्य प्रक्रिया नहीं है।पुलिस या जांच एजेंसी के नाम पर कोई व्यक्ति वीडियो कॉल करके पैसे जमा कराने की मांग करता है, तो यह साइबर ठगी का संकेत हो सकता है।किसी भी व्यक्ति को ऐसे कॉल से डरकर पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए।यदि कॉल करने वाला व्यक्ति खुद को अधिकारी बताता है, तो उसकी पहचान संबंधित विभाग के आधिकारिक नंबर से स्वतंत्र रूप से सत्यापित करनी चाहिए।अपराधियों द्वारा बताए गए फोन नंबर पर भरोसा करने के बजाय संबंधित एजेंसी की आधिकारिक वेबसाइट से संपर्क विवरण लेना बेहतर है।
साइबर ठगी से बचने के लिए बरतें सावधानी
साइबर अपराधी अक्सर लोगों को डर और जल्दबाजी में निर्णय लेने के लिए मजबूर करते हैं।वे दावा कर सकते हैं कि किसी व्यक्ति का आधार कार्ड, बैंक खाता या मोबाइल नंबर अपराध में इस्तेमाल हुआ है।इसके बाद गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर रकम मांगी जाती है।ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय कॉल समाप्त करना और पुलिस से संपर्क करना चाहिए।किसी अनजान व्यक्ति के साथ ओटीपी, बैंक पासवर्ड, यूपीआई पिन या अन्य गोपनीय जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाली वर्दी, पहचान पत्र या सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि को भी वास्तविक पहचान का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
ठगी होने पर तुरंत 1930 पर करें शिकायत
यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन आर्थिक धोखाधड़ी होती है, तो उसे तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए।इसके अलावा भारत सरकार के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल www.cybercrime.gov.in पर भी शिकायत की जा सकती है।समय पर शिकायत दर्ज कराने से संबंधित बैंक खातों में उपलब्ध रकम को रोकने की संभावना बढ़ सकती है।पीड़ित को कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर, चैट, बैंक ट्रांजेक्शन और अन्य संबंधित साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए।
पुलिस जांच से खुल सकती हैं और कड़ियां
रेवाड़ी में धारूहेड़ा के दंपति से 1.89 करोड़ रुपये की साइबर ठगी के मामले में दो और आरोपियों की गिरफ्तारी महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।अब जांच में यह पता लगाया जाना जरूरी होगा कि आरोपियों की ठगी में क्या भूमिका थी और क्या वे किसी बड़े साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े हैं।साथ ही ठगी की रकम की बरामदगी और अन्य संभावित आरोपियों की पहचान भी महत्वपूर्ण होगी।यह मामला लोगों को याद दिलाता है कि किसी भी सरकारी एजेंसी के नाम पर आने वाली धमकी भरी कॉल से घबराकर रकम ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए। जागरूकता और समय पर शिकायत साइबर ठगी से बचाव के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
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