हरियाणा

पेचकस बनाने की आड़ में ढल रहे थे नकली सिक्के, 14 महीने से चल रही थी अवैध फैक्ट्री

Kavita2
14 Sept 2026 5:29 PM IST
पेचकस बनाने की आड़ में ढल रहे थे नकली सिक्के, 14 महीने से चल रही थी अवैध फैक्ट्री
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सोनीपत। हरियाणा के सोनीपत स्थित बड़ी औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्री नंबर 136 में पेचकस बनाने की आड़ में कथित रूप से नकली सिक्के तैयार किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि यह अवैध गतिविधि पिछले करीब 14 महीनों से संचालित हो रही थी। फैक्ट्री किराये पर दिलाने वाले प्रॉपर्टी डीलर और संपत्ति मालिक की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। गन्नौर पुलिस दोनों से पूछताछ कर रही है और किरायेदारी से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही है।

पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपितों ने फैक्ट्री किराये पर लेते समय खुद को पेचकस और दूसरे औजार बनाने वाला कारोबारी बताया था। इसी व्यवसाय के नाम पर परिसर में मशीनें लगाई गई थीं। बाहर से देखने पर फैक्ट्री एक सामान्य औद्योगिक इकाई की तरह दिखाई देती थी, लेकिन आरोप है कि अंदर मशीनों का इस्तेमाल नकली सिक्के ढालने और उन्हें अंतिम रूप देने के लिए किया जा रहा था।

बताया जा रहा है कि आरोपितों ने फैक्ट्री की गतिविधियों को छिपाने के लिए योजनाबद्ध तरीका अपनाया। औद्योगिक क्षेत्र में मशीनों की आवाज और कच्चे माल की आवाजाही सामान्य बात होने के कारण आसपास के लोगों को शक नहीं हुआ। पेचकस निर्माण का दावा होने से धातु की चादरें, मशीनें, डाई, कटिंग उपकरण और अन्य सामान अंदर ले जाना भी आसान हो गया। इसी व्यवस्था का फायदा उठाकर कथित तौर पर लंबे समय तक नकली सिक्के तैयार किए जाते रहे।

जांच का महत्वपूर्ण पहलू फैक्ट्री को किराये पर दिए जाने की प्रक्रिया है। पुलिस को जानकारी मिली है कि एक स्थानीय प्रॉपर्टी डीलर ने आरोपितों की गारंटी लेकर फैक्ट्री मालिक से उनका संपर्क कराया था। आरोप है कि किरायेदारों का पुलिस सत्यापन नहीं कराया गया। फैक्ट्री में प्रस्तावित कारोबार से संबंधित जीएसटी नंबर और दूसरे जरूरी व्यावसायिक दस्तावेजों की भी जांच नहीं की गई। केवल प्रॉपर्टी डीलर के भरोसे परिसर किराये पर दे दिया गया।

अब पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि प्रॉपर्टी डीलर और फैक्ट्री मालिक को वहां चल रही वास्तविक गतिविधियों की जानकारी थी या नहीं। उनसे यह भी पूछा जा रहा है कि किरायेदारों ने कौन से पहचान पत्र जमा किए थे, किरायानामा तैयार कराया गया था या नहीं और हर महीने किराया किस माध्यम से दिया जाता था। बैंक खाते के जरिये भुगतान होने की स्थिति में लेन-देन का रिकॉर्ड भी खंगाला जा सकता है।

हालांकि, बिना सत्यापन संपत्ति किराये पर देना गंभीर लापरवाही का मामला हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि संपत्ति मालिक या डीलर नकली सिक्के बनाने के षड्यंत्र में शामिल थे। उनकी आपराधिक भूमिका दस्तावेजी साक्ष्यों, आर्थिक लेन-देन, आरोपितों से संपर्क और फैक्ट्री में आवाजाही संबंधी जानकारी के आधार पर ही तय होगी। पुलिस ने फिलहाल दोनों को पूछताछ के दायरे में रखा है।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, जांच अधिकारी यह भी पता लगा रहे हैं कि 14 महीनों के दौरान फैक्ट्री में कितने नकली सिक्के तैयार किए गए और उन्हें किन राज्यों व शहरों में पहुंचाया गया। नकली सिक्कों को बाजार में खपाने के लिए अलग-अलग एजेंटों, दुकानदारों या अन्य माध्यमों का इस्तेमाल किए जाने की आशंका है। छोटे लेन-देन में लोग अक्सर सिक्कों को ध्यान से नहीं देखते, इसलिए नकली सिक्के बाजार में चलाना अपेक्षाकृत आसान होता है।

नकली सिक्के बनाने वाले गिरोह आमतौर पर ऐसी जगहों को चुनते हैं जहां मशीनों और धातु से संबंधित काम पहले से होता हो। इससे कटिंग, प्रेसिंग और डाई मशीनों की मौजूदगी पर तुरंत संदेह नहीं होता। पेचकस निर्माण की आड़ भी इसी कारण चुनी गई हो सकती है। जांच एजेंसियां फैक्ट्री से बरामद मशीनों और कच्चे माल का तकनीकी परीक्षण कराकर यह पता लगा सकती हैं कि वहां कितने समय से उत्पादन हो रहा था।

फैक्ट्री और आसपास के मार्गों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग भी जांच में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इससे वहां आने-जाने वाले लोगों, मालवाहक वाहनों और कच्चा माल पहुंचाने वालों की पहचान की जा सकती है। पुलिस बिजली की खपत का रिकॉर्ड भी देख सकती है, क्योंकि भारी मशीनों के नियमित संचालन से खपत के स्वरूप में बदलाव सामने आ सकता है। फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियों और पड़ोसी इकाइयों के संचालकों से भी जानकारी जुटाई जा रही है।

यह मामला औद्योगिक क्षेत्रों में किरायेदार सत्यापन और व्यावसायिक इकाइयों की नियमित निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। बिना पुलिस सत्यापन और वैध व्यावसायिक दस्तावेजों के किसी बाहरी व्यक्ति को फैक्ट्री किराये पर देना सुरक्षा के लिहाज से जोखिमपूर्ण हो सकता है। औद्योगिक परिसरों में मशीनों और भारी मात्रा में कच्चे माल का इस्तेमाल होता है, इसलिए अवैध गतिविधियों को सामान्य कारोबार की आड़ में छिपाना आसान हो जाता है।

पुलिस अब आरोपितों के मोबाइल फोन, बैंक खातों और संपर्कों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि तैयार नकली सिक्कों की आपूर्ति कौन करता था और उनसे मिलने वाली रकम किसके पास पहुंचती थी। फैक्ट्री के संचालन में स्थानीय स्तर पर मदद करने वाले लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि फैक्ट्री मालिक और प्रॉपर्टी डीलर की भूमिका केवल लापरवाही तक सीमित थी या उन्हें अवैध कारोबार की जानकारी थी। फिलहाल गन्नौर पुलिस उनसे पूछताछ के साथ उपलब्ध दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों का मिलान कर रही है। इस खुलासे ने औद्योगिक क्षेत्र के अन्य फैक्ट्री मालिकों को भी किरायेदारों का सत्यापन कराने और व्यावसायिक दस्तावेजों की जांच करने की जरूरत का अहसास कराया है।

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