हरियाणा

चंडीगढ़ में देर से निकला करवाचौथ का चांद, सुहागिनों ने अर्घ्य देकर खोला व्रत

Rajeshwari Nishad
29 Oct 2026 9:55 PM IST
चंडीगढ़ में देर से निकला करवाचौथ का चांद, सुहागिनों ने अर्घ्य देकर खोला व्रत
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चंडीगढ़। पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ गुरुवार को चंडीगढ़ में करवाचौथ का त्योहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से निर्जला व्रत रखकर चंद्रमा के दर्शन का इंतजार कर रही महिलाओं के चेहरों पर उस समय खुशी दिखाई दी, जब रात में चांद नजर आया। चंद्रमा के दर्शन के बाद सुहागिन महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का समापन किया। इस दौरान महिलाओं ने अपने पतियों की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। करवाचौथ के अवसर पर शहर में उत्सव का माहौल रहा और महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर इस विशेष पर्व को मनाया।
गुरुवार को सुबह से ही करवाचौथ को लेकर महिलाओं में खास उत्साह देखने को मिला। कई महिलाओं ने सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत की शुरुआत की। इसके बाद दिनभर बिना अन्न और जल ग्रहण किए चंद्रमा के दर्शन का इंतजार किया। शाम होते ही घरों में पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं। महिलाओं ने पूजा की थालियां सजाईं और करवाचौथ की कथा सुनकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
चंडीगढ़ में इस वर्ष करवाचौथ पर चंद्रोदय का निर्धारित समय रात करीब 8 बजकर 12 मिनट था। हालांकि, वास्तविक चंद्रदर्शन का समय स्थानीय मौसम और आसपास की परिस्थितियों के कारण अलग हो सकता है। चंद्रमा दिखाई देने के बाद महिलाओं ने पारंपरिक विधि से अर्घ्य अर्पित किया और अपना व्रत खोला।
करवाचौथ की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा चंद्रमा को अर्घ्य देने की होती है। चंद्रदर्शन के बाद महिलाएं छलनी से चांद को देखती हैं और इसके बाद अपने पति का चेहरा देखती हैं। कई परिवारों में पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत खुलवाते हैं। इस परंपरा को पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
शाम के समय महिलाएं लाल, गुलाबी, मैरून और अन्य आकर्षक रंगों के पारंपरिक परिधानों में नजर आईं। साड़ी, लहंगा और सूट के साथ महिलाओं ने चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र और अन्य श्रृंगार किए। हाथों में मेहंदी और सजी हुई पूजा की थालियों ने त्योहार की रौनक बढ़ाई। कई परिवारों में पूजा सामूहिक रूप से की गई, जहां महिलाओं ने एक साथ बैठकर करवाचौथ की कथा सुनी।
करवाचौथ के अवसर पर चंडीगढ़ के साथ मोहाली और पंचकूला में भी त्योहार को लेकर उत्साह रहा। ट्राइसिटी क्षेत्र में दिनभर पूजा सामग्री, मिठाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी का माहौल बना रहा। इस त्योहार को लेकर बाजारों में पहले से ही विशेष तैयारियां की गई थीं।
करवाचौथ की परंपरा विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लोकप्रिय है। इस दिन विवाहित महिलाएं पारंपरिक रूप से अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। हालांकि, अलग-अलग परिवारों में पूजा की विधि और व्रत से जुड़े रीति-रिवाजों में कुछ अंतर देखने को मिलता है।
इस साल करवाचौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया गया। पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर यह पर्व मनाया जाता है। चंडीगढ़ में पूजा का शुभ मुहूर्त शाम करीब 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक निर्धारित था। इसके बाद महिलाओं ने चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा की।
करवाचौथ के दौरान सरगी की परंपरा का भी विशेष महत्व है। पंजाब और हरियाणा के कई परिवारों में सास अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसमें फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं। महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद व्रत की शुरुआत करती हैं।
इस बार चंडीगढ़ में करवाचौथ के साथ महिलाओं के कामकाजी जीवन और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन की भी चर्चा रही। शहर की कई कामकाजी महिलाओं ने कार्यालयों और अन्य जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए व्रत रखा। प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस विभाग और व्यवसाय से जुड़ी महिलाओं ने भी इस अवसर पर अपनी पारिवारिक परंपराओं को निभाया।
कुछ कामकाजी महिलाओं ने बताया कि कार्यालय की जिम्मेदारियों के बीच निर्जला व्रत रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इसके बावजूद वे अपनी आस्था और पारिवारिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए त्योहार मनाती हैं। कई महिलाओं के लिए करवाचौथ केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव और आपसी सहयोग का अवसर भी है।
करवाचौथ की पूजा में मिट्टी या धातु के करवे, दीपक, छलनी, मिठाई, फल और जल से भरे पात्र का विशेष महत्व होता है। महिलाएं पूजा के दौरान भगवान गणेश, माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं। इसके बाद करवाचौथ व्रत कथा सुनने की परंपरा निभाई जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, करवाचौथ का व्रत पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस पर्व से जुड़ी वीरावती की कथा भी काफी प्रचलित है। पूजा के दौरान महिलाओं को यह कथा सुनाई जाती है, जिसमें व्रत के महत्व और पारिवारिक संबंधों का वर्णन मिलता है।
आधुनिक समय में करवाचौथ मनाने के तरीकों में बदलाव भी दिखाई दे रहा है। कई परिवार इस त्योहार को आपसी प्रेम और सम्मान के अवसर के रूप में मनाते हैं। कुछ पति भी अपनी पत्नियों के साथ व्रत रखते हैं। वहीं, सोशल मीडिया के माध्यम से लोग अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं भेजते हैं और त्योहार की तस्वीरें साझा करते हैं।
इस पर्व का सांस्कृतिक महत्व भी काफी व्यापक है। करवाचौथ के दौरान पारंपरिक पहनावे, मेहंदी, आभूषण और सामूहिक पूजा के माध्यम से परिवारों में उत्सव का वातावरण बनता है। खास तौर पर नई विवाहित महिलाओं के लिए पहला करवाचौथ विशेष महत्व रखता है। परिवार के सदस्य इस अवसर को यादगार बनाने के लिए विशेष तैयारियां करते हैं।
चंडीगढ़ में करवाचौथ की शाम चंद्रमा के दर्शन के साथ व्रत का समापन हुआ। दिनभर पूजा और चांद के इंतजार के बाद महिलाओं ने अपने परिवारों के साथ त्योहार मनाया। पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास की परंपरा से जुड़ा यह पर्व एक बार फिर श्रद्धा, आस्था और पारिवारिक खुशियों का प्रतीक बना।
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