Hisar: धान की खेती में आधुनिक जल प्रबंधन पर काम करेंगे एफएओ व एचएयू

हिसार: हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) जीईएफ-7 फोलुर परियोजना के तहत एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना पर संयुक्त रूप से कार्य करेंगे। इस परियोजना का उद्देश्य ब्रूइंग यीस्ट सैक्रोमाइसीस सेरेविसीए आधारित जैविक बीज उपचार तकनीक के माध्यम से धान की फसल में जल उपयोग दक्षता बढ़ाना तथा सीधी बिजाई प्रणाली (डीएसआर) को अधिक प्रभावी और किसान-अनुकूल बनाना है।
एचएयू के कुलपति प्रो. बी.आर. कम्बोज ने सोमवार को बताया कि हरियाणा में प्रचलित धान-गेहूं फसल चक्र के कारण भूजल दोहन, मृदा क्षरण, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यह परियोजना टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि परियोजना के तहत धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) तकनीक को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सैक्रोमाइसीस सेरेविसीए आधारित जैविक बीज उपचार का परीक्षण किया जाएगा। शोध में यह अध्ययन किया जाएगा कि इस तकनीक से बीजों के अंकुरण, प्रारंभिक वृद्धि, पौधों की मजबूती और जल उपयोग दक्षता में किस प्रकार सुधार होता है।
कुलपति ने बताया कि पारंपरिक धान रोपाई पद्धति में पानी और श्रम की अधिक आवश्यकता होती है, जबकि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण और लागत में कमी का बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। यदि शोध के परिणाम सकारात्मक रहे तो यह तकनीक किसानों के लिए कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और आसानी से अपनाई जा सकने वाली नवाचार तकनीक साबित होगी।
उन्होंने कहा कि इससे डीएसआर प्रणाली के व्यापक प्रसार को बढ़ावा मिलेगा, भूजल संरक्षण में मदद मिलेगी और धान-गेहूं आधारित कृषि प्रणाली अधिक टिकाऊ बन सकेगी।
परियोजना के नोडल अधिकारी मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. राजेश गेरा बनाए गए हैं, जबकि सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा सांगवान को परियोजना का प्रधान अन्वेषक नियुक्त किया गया है। इस अवसर पर अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग भी उपस्थित रहे।





