
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दो नाबालिग बहनों के रेप और मर्डर के मामले में चार लोगों की सज़ा और मौत की सज़ा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई कानूनी रूप से मान्य सबूत पेश करने में नाकाम रहा जो इनमें से किसी को भी अपराध से जोड़ता हो।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस रमेश चंद्र डिमरी की बेंच ने इस दौरान यह जांचने के लिए एक "छह-बिंदुओं वाला टेस्ट" (sextipartite test) बताया कि क्या किसी खुलासे और उससे हुई बरामदगी पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि खुलासे और बरामदगी को छह-बिंदुओं वाले टेस्ट से गुज़रना होगा। यह जांचने से पहले कि क्या खुलासे वाले बयान की बातें जांच अधिकारी ने साबित की हैं, या क्या बरामद की गई चीज़ किसी ऐसी खुली जगह पर थी जहाँ तक आसानी से पहुँचा जा सके और वह दिखाई दे रही हो, यह टेस्ट ज़रूरी है।
इसे "छह-बिंदुओं वाला टेस्ट" बताते हुए बेंच ने कहा कि खुलासा करने वाला व्यक्ति पहले से ही उस मामले में आरोपी होना चाहिए; खुलासा करते समय वह हिरासत में होना चाहिए; खुलासा अपनी मर्ज़ी से किया गया हो और उसमें कोई "मजबूरी, ज़बरदस्ती, धमकी, लालच या धोखा" न हो; जानकारी में अपराध से जुड़ी कोई अहम बात हो; जानकारी "बरामद की गई चीज़ से साफ़ तौर पर जुड़ी हो"; और सबसे ज़रूरी बात, "खुलासे के बाद जो चीज़ बरामद की गई, वह पहले से बरामद नहीं की गई होनी चाहिए"।
आखिरी शर्त इस मामले में अहम हो गई क्योंकि कोर्ट ने पाया कि आरोपी के कहने पर जो "परना" (कपड़ा) बरामद किया गया था, उसे क्राइम-सीन टीम पहले ही देख चुकी थी। बेंच ने कहा कि जो बात पहले ही पता चल चुकी हो, उसकी 'बरामदगी' नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि यह साबित नहीं हो पाया है कि बरामदगी किसी आरोपी के कहने पर की गई थी।"





