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हरियाणा कांग्रेस ने जिला इकाइयों को दिया तीन महीने का टारगेट

Kiran
22 Sept 2026 12:04 PM IST
हरियाणा कांग्रेस ने जिला इकाइयों को दिया तीन महीने का टारगेट
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Haryana हरियाणा कांग्रेस ने अपने ज़िला संगठन को तीन महीने की समय-सीमा दी है और ज़िला कांग्रेस कमेटियों (DCCs) से कहा है कि वे सिर्फ़ काम की रिपोर्ट जमा करने के बजाय ठोस और मापने योग्य नतीजे दें। हरियाणा कांग्रेस मामलों के प्रभारी संजय दत्त ने संकेत दिया है कि जो ज़िले और ब्लॉक तय मानकों को पूरा नहीं कर पाएंगे, उनकी जांच हो सकती है और संगठनात्मक अभियान के अगले चरण में उनके नेतृत्व की समीक्षा की जा सकती है।
तीन महीने की समय-सीमा क्या है?
हर ज़िला कांग्रेस कमेटी (DCC) से कहा गया है कि वह अगले तीन महीनों के लिए मापने योग्य लक्ष्यों के साथ एक स्पष्ट और समय-सीमा वाला एक्शन प्लान तैयार करे। यह कवायद 17 सितंबर को गुरुग्राम में ज़िला इकाइयों की समीक्षा के बाद शुरू हुई है, जिसकी अध्यक्षता PCC अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह ने की थी और जिसमें हरियाणा कांग्रेस मामलों के प्रभारी संजय दत्त और AICC सचिव जितेंद्र बघेल शामिल हुए थे। ज़ोर इस बात पर है कि ज़िला अध्यक्षों का मूल्यांकन ज़मीन पर किए गए ठोस कामों के आधार पर किया जाए, न कि राज्य नेतृत्व को सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर।
ज़िला इकाइयों का मूल्यांकन किन मानकों पर किया जाएगा?
मूल्यांकन में मंडल मैपिंग, ब्लॉक कांग्रेस सम्मेलन, SIR से जुड़े काम, बूथ-स्तर पर वोटर सहायता केंद्रों का कामकाज और स्थानीय जन-मुद्दों की पहचान और उन पर कार्रवाई शामिल है। ज़िला अध्यक्षों से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे सक्रिय नेतृत्व दिखाएं और DCC स्तर से नीचे संगठनात्मक कामकाज की नियमित निगरानी करें। असल में, इस समीक्षा का मकसद यह पता लगाना है कि क्या पार्टी का संगठनात्मक ढांचा ज़िला स्तर से लेकर मंडल और बूथ स्तर तक प्रभावी ढंग से काम कर रहा है।
कांग्रेस अब जवाबदेही क्यों बढ़ा रही है?
यह कवायद हरियाणा में कांग्रेस के ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है। दत्त और राव नरेंद्र सिंह राज्य का दौरा कर रहे हैं और ब्लॉक-स्तरीय बैठकों में शामिल हो रहे हैं, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी सम्मेलनों की ज़िम्मेदारी सौंपी जा रही है। 18 से 21 सितंबर के बीच आठ ब्लॉक सम्मेलन तय किए गए थे, जिनमें नेतृत्व ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद और बूथ स्तर पर गतिविधियों को बढ़ाने पर ज़ोर दिया। इससे पता चलता है कि कांग्रेस चाहती है कि ज़िला कमेटियां सिर्फ़ प्रशासनिक ढांचे बनकर न रह जाएं, बल्कि ऐसी सक्रिय राजनीतिक इकाइयां बनें जो कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सकें और स्थानीय मुद्दों को उठा सकें।
अगर कोई ज़िला इस परीक्षा में फेल हो जाता है तो क्या होगा?
यहीं पर तीन महीने की यह कवायद अहम हो जाती है। दत्त ने संकेत दिया है कि जो ज़िले और ब्लॉक तय संगठनात्मक मानकों को पूरा नहीं कर पाएंगे, अभियान के दूसरे चरण में उनकी समीक्षा की जा सकती है। इस समीक्षा के दायरे में मौजूदा लीडरशिप भी आ सकती है, हालांकि उन्हें हटाने का कोई ऑटोमैटिक फ़ॉर्मूला घोषित नहीं किया गया है। इसलिए, ज़िला अध्यक्षों के लिए अगले तीन महीने एक तरह का परफ़ॉर्मेंस टेस्ट होंगे: उन्हें लक्ष्य तय करने होंगे, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता दिखानी होगी और मापने लायक प्रगति करके दिखानी होगी। लीडरशिप का पैमाना साफ़ है — कागज़ी कार्रवाई नहीं, बल्कि ज़मीनी नतीजे।
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