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ड्रोन और जमीनी टीमें सक्रिय
चंडीगढ़: धान की कटाई के मौसम में पराली जलाने और उससे उठने वाले धुएं को लेकर चिंता बढ़ रही है। पंजाब और हरियाणा के खेतों में आग की घटनाओं पर सैटेलाइट से नजर रखी जाती है। हरियाणा सरकार ने ड्रोन निगरानी और जमीनी गश्त मजबूत करने की व्यवस्था भी घोषित की है। हालांकि, चंडीगढ़ में किसी दिन मौजूद धुएं का कितना हिस्सा किस राज्य से आया, यह केवल आग की घटनाएं गिनकर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए हवा की दिशा, मौसम और स्थानीय प्रदूषण स्रोतों का अध्ययन जरूरी है।
पुराने आंकड़ों को ताजा स्थिति न समझें
पंजाब में हरियाणा से अधिक पराली जलने संबंधी उपलब्ध एक रिपोर्ट तीन अक्टूबर 2025 की है। उसमें पंजाब यूनिवर्सिटी और पीजीआई की संयुक्त निगरानी का उल्लेख था। उस रिपोर्ट के आंकड़ों को अक्टूबर 2026 की स्थिति के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। दोनों राज्यों की मौजूदा तुलना के लिए समान तारीख तक के प्रमाणित आंकड़े चाहिए। इसी तरह किसी विशेष सप्ताह की स्थिति पूरे कटाई सीजन का अंतिम रुझान नहीं बताती।
हरियाणा में ड्रोन और गश्त की व्यवस्था
हरियाणा सरकार की 24 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति के अनुसार, जिला और ब्लॉक स्तर पर ‘पराली संरक्षण बल’ गठित करने का निर्णय लिया गया है। इसमें पुलिस, कृषि विभाग और प्रशासन से जुड़े अधिकारी शामिल होंगे। खेतों में आग की घटनाओं की निगरानी के लिए ड्रोन इस्तेमाल करने और देर शाम तथा रात में गश्त बढ़ाने की बात कही गई है। यह व्यवस्था हरियाणा की है; इसे चंडीगढ़ प्रशासन की अलग योजना नहीं माना जाना चाहिए। सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी के बेहतर उपयोग के लिए किसानों को 1,200 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन का प्रावधान भी बताया है। योजना में गांव स्तर के नोडल अधिकारियों, मोबाइल ऐप से सूचना और मशीनरी उपलब्ध कराने के समन्वय को महत्व दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि रोकथाम के लिए केवल घटनाएं पकड़ना नहीं, बल्कि किसानों तक संसाधन पहुंचाना भी घोषित कार्ययोजना का हिस्सा है।
सैटेलाइट निगरानी कैसे मदद करती है?
केंद्र सरकार के अनुसार, फसल अवशेष जलाने की सक्रिय घटनाओं की पहचान सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग से की जाती है। इसके लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल अपनाया गया है। समान पद्धति से तैयार आंकड़े अलग-अलग क्षेत्रों और वर्षों की तुलना में मदद करते हैं। फिर भी दर्ज आग की संख्या और कुल जले क्षेत्र का अर्थ एक नहीं होता। विस्तृत आकलन में आग के स्थान के साथ प्रभावित क्षेत्र जैसी जानकारी भी उपयोगी होती है। ड्रोन स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त जानकारी जुटाने का साधन हो सकते हैं। सैटेलाइट से व्यापक क्षेत्र की तस्वीर मिलती है, जबकि जमीनी टीम किसी सूचना की पुष्टि कर सकती है। इन माध्यमों को साथ इस्तेमाल करने से निगरानी की उपयोगिता बढ़ सकती है। हालांकि, ड्रोन तैनात होने का मतलब हर खेत की हर समय निगरानी होना नहीं है। परिणाम संसाधनों, कवरेज और सूचना पर होने वाली कार्रवाई पर निर्भर करेंगे।
चंडीगढ़ तक धुआं पहुंचने में मौसम की भूमिका
कृषि अवशेष का धुआं हवा के साथ दूसरे इलाकों तक जा सकता है। लेकिन उसका रास्ता स्थिर नहीं रहता। हवा की दिशा और गति बदलने पर प्रभावित क्षेत्र भी बदल सकते हैं। इसलिए किसी पड़ोसी राज्य में अधिक आग दर्ज होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि शहर के प्रदूषण का अधिकांश हिस्सा वहीं से आया है। स्रोत का सटीक योगदान तय करना वैज्ञानिक विश्लेषण का विषय है। सर्दियों में कम तापमान, धीमी हवाएं और प्रदूषकों के फैलाव के लिए सीमित ऊंचाई जैसी परिस्थितियां हवा खराब कर सकती हैं। तापमान उलटाव की स्थिति में प्रदूषक जमीन के नजदीक फंस सकते हैं। ऐसे मौसम में उत्सर्जन की समान मात्रा भी अलग असर दिखा सकती है। यही कारण है कि आग की घटनाओं और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को मौसम के संदर्भ के साथ पढ़ना चाहिए।
आग की गिनती ही पूरी तस्वीर नहीं
सैटेलाइट आधारित निगरानी की सीमाओं पर शोध भी हो रहा है। एक हालिया अध्ययन ने कुछ सेंसरों से दर्ज आग की घटनाओं में गिरावट और क्षेत्रीय प्रदूषण की स्थिति के बीच अंतर की जांच की है। इससे निगरानी के समय और विभिन्न डेटा स्रोतों को जोड़ने का महत्व सामने आता है। केवल एक आंकड़े के आधार पर पराली की समस्या खत्म होने या बढ़ने का निष्कर्ष निकालना अधूरा हो सकता है।
पराली प्रबंधन में निगरानी के साथ व्यावहारिक विकल्प जरूरी हैं। मशीन उपलब्ध होने के अलावा उसका सही समय पर मिलना, उपयोग की लागत और फसल अवशेष के आगे इस्तेमाल की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। किसानों की जरूरतों तथा स्थानीय परिस्थितियों को समझे बिना केवल तकनीकी निगरानी से स्थायी समाधान की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा। फिलहाल स्पष्ट जानकारी यह है कि पराली की निगरानी में सैटेलाइट के साथ ड्रोन और जमीनी व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। पंजाब-हरियाणा की ताजा तुलना और चंडीगढ़ में धुएं के वास्तविक योगदान के लिए अद्यतन प्रमाणित आंकड़े आवश्यक हैं। पुराने प्रतिशत या केवल दिखाई देने वाले धुएं के आधार पर किसी एक स्रोत को पूरा जिम्मेदार बताना उचित नहीं होगा।
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