बैलगाड़ी से जहाज तक, हड़प्पावासियों ने फैलाया था व्यापार का जाल

हिसार: राखीगढ़ी की प्राचीन सभ्यता अपनी विकसित नगर व्यवस्था और जीवनशैली के साथ उन्नत कृषि, शिल्पकला तथा दूर-दराज के क्षेत्रों से व्यापारिक संबंधों के लिए भी विशिष्ट पहचान रखती है। हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने बैलगाड़ियों से सामान का परिवहन करने के साथ बाद में समुद्री मार्गों के जरिए भी व्यापारिक संपर्क विकसित किए। गुजरात के लोथल में हुई खुदाई से समुद्री व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं।
यह जानकारी डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. वसंत शिंदे ने रविवार को राखीगढ़ी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान दी। उन्होंने कहा कि राखीगढ़ी विश्व की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है। यहां हड़प्पा अनुसंधान केंद्र और सूचना केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि देश-विदेश के शोधार्थियों, विद्यार्थियों और पर्यटकों को इस प्राचीन सभ्यता के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिल सके।
कृषि और व्यापार से मजबूत हुई अर्थव्यवस्था
डॉ. शिंदे ने बताया कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता के लोगों ने कृषि को आजीविका का प्रमुख आधार बनाया और बाद में व्यापार के माध्यम से अपनी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया। इस सभ्यता से जुड़े लगभग दो हजार बसावट स्थलों की पहचान हुई है, जिनमें करीब 1500 स्थल सरस्वती नदी के आसपास बताए जाते हैं। नदियों के निकट पानी की उपलब्धता ने खेती के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि हड़प्पा सभ्यता के लोग दूसरी जगहों से तांबा, पत्थर, मनके बनाने के लिए कच्चा माल और अन्य वस्तुएं लाते थे। इनसे तैयार उत्पादों को बेहतर ढंग से परिष्कृत कर दूसरे क्षेत्रों में भेजा जाता था। इस तरह शिल्प और व्यापार एक-दूसरे के पूरक बनकर आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करते थे।
डॉ. शिंदे के अनुसार, उस समय के लोगों के व्यापारिक संपर्क ओमान, मिस्र और मेसोपोटामिया जैसे क्षेत्रों तक फैले हुए थे। इन संपर्कों ने नगरों के विकास में योगदान दिया। राखीगढ़ी में नियोजित नगर व्यवस्था, विकसित आवासीय ढांचे और शिल्प गतिविधियों के प्रमाण उस समय की उन्नत जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं।
राजा-रानी और बड़े मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं
हड़प्पा सभ्यता की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर चर्चा करते हुए डॉ. शिंदे ने कहा कि अब तक मिले पुरातात्विक साक्ष्यों में राजा-रानी की व्यवस्था के स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आए हैं। इसी तरह बड़े मंदिरों और सेना में इस्तेमाल होने वाले हथियारों से जुड़े प्रमाण भी निर्णायक नहीं हैं। इसलिए उस समय की शासन व्यवस्था को समझने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों का गहन अध्ययन जरूरी है।
उन्होंने बताया कि कुछ मुहरों पर धार्मिक प्रतीक और पशुपति से संबंधित माने जाने वाले चिह्न मिले हैं। विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मूर्तियां, कलाकृतियां और अन्य अवशेष तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जानकारी देते हैं।
डॉ. शिंदे ने अग्नि पूजा से जुड़े साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि धोलावीरा, कालीबंगा और राखीगढ़ी जैसे स्थलों पर अग्निकुंड मिलने की जानकारी सामने आई है। इन प्रमाणों के आधार पर प्राचीन धार्मिक परंपराओं और वैदिक साहित्य के बीच संभावित संबंधों पर आगे शोध किया जा सकता है।
साहित्य और पुरातत्व के तुलनात्मक अध्ययन पर जोर
हरियाणा के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के उपनिदेशक डॉ. नरेंद्र परमार ने कहा कि प्राचीन सभ्यताओं से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों और साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने से कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं। उन्होंने राखीगढ़ी को प्राचीन मानव सभ्यता और उसके विकास को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थल बताया।
डॉ. परमार ने जानकारी दी कि राखीगढ़ी के संग्रहालय को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसके आंतरिक हिस्से को आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रस्तुतीकरण के माध्यम से विकसित किया जाएगा। इसके लिए 188 करोड़ रुपये की राशि मंजूर किए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी।
राखीगढ़ी महोत्सव में गांव के लोगों को जोड़ने की योजना
डॉ. परमार ने बताया कि भविष्य में राखीगढ़ी महोत्सव को और व्यापक स्तर पर आयोजित करने की योजना है। इसके तहत कार्यक्रमों को केवल पुरातात्विक टीलों तक सीमित रखने के बजाय गांव के भीतर भी विभिन्न गतिविधियां आयोजित करने और स्थानीय लोगों को उनसे जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
इस पहल से पर्यटकों को राखीगढ़ी की प्राचीन सभ्यता के साथ स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन को करीब से जानने का अवसर मिल सकेगा।





