High Court में जज के खिलाफ शिकायत, चीफ जस्टिस शील नागू ने केस वापस लेकर शुरू की सुनवाई

State Bureau.राज्य ब्यूरोचंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू ने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी भी मामले को, चाहे वह सुनवाई के लिए हो या निर्णय के लिए सुरक्षित हो, किसी भी बेंच से वापस लेकर दूसरी बेंच को सौंपने का पूरा अधिकार है। उन्होंने यह टिप्पणी मशहूर रियल एस्टेट ग्रुप एम3एम प्रमोटर रूप कुमार बंसल की मनी लॉन्ड्रिंग एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह मामला एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा 17 अप्रैल को पंचकूला में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसमें कुछ नामजद व कुछ अज्ञात आरोपियों के साथ याचिकाकर्ता रूप बंसल को भी आरोपी बनाया गया है। पहले यह मामला सिंगल बेंच के समक्ष था। जहां 2 मई को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था और 12 मई को फैसला सुनाया जाना था।
चीफ जस्टिस को इस मामले से संबंधित कुछ शिकायतें मिली थीं, जिसके आधार पर उन्होंने 10 मई को प्रशासनिक आदेश पारित कर सिंगल बेंच के जज से केस वापस लेकर अपनी सिंगल बेंच में दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया था। यह वीडियो भी देखेंयाचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आपत्ति जताई कि जब किसी मामले की सुनवाई पूरी हो जाती है और फैसला सुरक्षित रख लिया जाता है, तो उसे स्थानांतरित करना न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है। उन्होंने दलील दी कि एक बार जब मामला किसी न्यायाधीश को सौंप दिया जाता है, तो उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मास्टर ऑफ रोस्टर की संवैधानिक भूमिका का हवाला देते हुए कहा कि अगर न्यायपालिका की निष्पक्षता, गरिमा और जनता के विश्वास पर कोई सवाल उठता है,
तो ऐसे मामलों में उनका हस्तक्षेप न केवल उचित है, बल्कि अनिवार्य भी है।उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में पीठ का पुनर्गठन पूरी तरह से उचित है। प्रवर्तन निदेशालय ने भी कोर्ट को बताया कि रूप बंसल के खिलाफ प्रवर्तन मामलों की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) पहले से ही दर्ज है, जो मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित है। ईडी ने मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप को पूरी तरह से आवश्यक और संवेदनशील बताया।कोर्ट ने याचिकाकर्ता की आपत्ति को खारिज करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 26 मई तय की है। इस दौरान मुख्य रूप से मामले के तथ्यों पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक न्यायपालिका की निष्पक्षता और जनता का भरोसा बरकरार रहेगा, तभी न्याय का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है। ऐसे में संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी शिकायत पर त्वरित कार्रवाई न्याय के हित में है।





