Chandigarh: कफ सिरप माफिया केस: सिस्टम की मिलीभगत की आशंका

चंडीगढ़: देश में कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध बिक्री और तस्करी तेजी से बढ़ रही है। पिछले कुछ महीनों में ही उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल और दिल्ली-एनसीआर से लाखों बोतलें पकड़ी गई हैं, जिनकी कीमत करोड़ों में है।
प्रश्न केवल इतना नहीं कि तस्करों ने सिरप कहाँ छुपाया था —प्रश्न यह है कि यह सिरप बना कैसे?
कोडीन सिरप बनता कैसे है?
कोडीन आधारित कफ सिरप (जैसे Eskuf) बनाने के लिए दो सरकारी मंजूरियां अनिवार्य हैं-
यानी — बिना इन दो मंजूरियों के एक भी बोतल कानूनी रूप से बन ही नहीं सकती।
फिर सवाल उठता है:
जब लाखों बोतलें पकड़ी जा रही हैं
फर्जी कंपनियाँ पकड़ी जा रही हैं
नकली लेटरहेड और घोस्ट फर्म मिल रही हैं…
तो ये सारी मंजूरियां किसने दीं? और कैसे दीं?
किन अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे हैं प्रश्न?
मीडिया रिपोर्टों और सूत्रों के अनुसार, दो महत्वपूर्ण विभाग चर्चा में हैं।जिनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।लाइसेंस जारी करने और निरीक्षण का जिम्मा है स्टेट ड्रग कंट्रोलर व सी बी एन(Central Bureau of Narcotics).(नारकोटिक कोटा अलॉटमेंट – यानि कोडीन एलोकेशन का जिम्मा) इसमें अहम है।
यह रिपोर्ट किसी को दोषी घोषित नहीं करती।
यह केवल यह कहती है कि —जब पूरा नेटवर्क इन दो विभागों की अनुमति से ही चल सकता है,तो इनकी भूमिका की जांच अनिवार्य है।
हर खेप में मिलती हैं एक जैसी बातें
• फर्जी फार्मा कंपनियों के लेटरहेड
• नकली GST और ड्रग लाइसेंस
• बिना रिकॉर्ड सप्लाई
• हवाला के ज़रिये पैसा
लेकिन…
CBN के रिकॉर्ड में सब “OK”
State Drugs Office के रिकॉर्ड में सब “Compliant”
तो फिर ये सिरप बना कहाँ, और गया कहाँ?
5 बड़े सवाल जो कोई पूछ नहीं रहा:
क्या कोडीन सिरप का एलॉटमेंट CBN की मंजूरी के बिना संभव है?
बंद कंपनियों के नाम पर उत्पादन रिपोर्ट कैसे जमा होती रही?
क्या State FDA ने निरीक्षण केवल कागज़ों पर किया?
क्यों हर मामले में छोटे स्तर के तस्कर पकड़े जाते हैं, अधिकारी नहीं?
क्या यह पूरा तंत्र बिना अंदरूनी “सहयोग” के चल सकता है?
यह सिर्फ दवा तस्करी नहीं – यह Regulatory Capture है
• कागज़ों में सब वैध
• जमीन पर पूरा अवैध नेटवर्क
• और सिस्टम… खामोश
अब क्या होना चाहिए?
CBI जांच – 2018 से जारी सभी Codeine License & Quota Files पर
CBN और State Drugs Office की Vigilance Inquiry
सभी कोडीन बेस्ड दवाओं की DIGITAL TRACKING SYSTEM तत्काल लागू हो
जब तक सिस्टम पर सवाल नहीं उठेंगे – तस्करी नहीं रुकेगी
नाम बदल जाएंगे, कंपनियों के पते बदल जाएंगे, लेकिन:
अगर लाइसेंस जारी करने वाले और क्वोटा देने वाले विभागों की जवाबदेही तय नहीं होगी —
तो यह खेल चलता रहेगा।
**यह रिपोर्ट जनहित में लिखी गई है। यदि संबंधित अधिकारी या विभाग अपनी प्रतिक्रिया भेजते हैं, तो उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।





