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CWG 2026 में भिवानी की बेटियों का जलवा, 30 मिनट में जीते दो गोल्ड

Saba Naaz
1 Aug 2026 6:45 PM IST
CWG 2026 में भिवानी की बेटियों का जलवा, 30 मिनट में जीते दो गोल्ड
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हरियाणा: भिवानी की धरती ने एक बार फिर भारतीय मुक्केबाजी में अपना दबदबा साबित कर दिया है। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भिवानी की बेटियों जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति साई पवार ने स्वर्ण पदक जीतकर न केवल देश का नाम रोशन किया, बल्कि इस शहर की पहचान ‘मिनी क्यूबा’ को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। दोनों खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि भिवानी की मिट्टी आज भी देश के लिए चैंपियन मुक्केबाज तैयार कर रही है।

जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति साई पवार के गोल्ड मेडल सिर्फ खेल उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि वर्षों पुरानी मुक्केबाजी परंपरा की नई कहानी हैं। जिस भिवानी की पहचान कभी कैप्टन हवा सिंह, विजेंद्र सिंह, अखिल कुमार और जितेंद्र जैसे दिग्गज मुक्केबाजों से बनी थी, अब उसी विरासत को बेटियां आगे बढ़ा रही हैं। ग्लासगो में दोनों महिला मुक्केबाजों के स्वर्णिम पंचों ने पूरी दुनिया में भिवानी का नाम चमका दिया।

भिवानी में मुक्केबाजी की नींव कई दशक पहले रखी गई थी। कैप्टन हवा सिंह ने इस शहर में खेल संस्कृति को मजबूत आधार दिया। इसके बाद कई खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर भिवानी को मुक्केबाजी के नक्शे पर स्थापित किया। वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक के बाद इस शहर ने भारतीय मुक्केबाजी में एक अलग पहचान बनाई और लगातार बड़े खिलाड़ी दिए।

2008 बीजिंग ओलंपिक में भी भिवानी का दबदबा देखने को मिला था। भारतीय दल में शामिल कई मुक्केबाज इसी शहर से थे। उस समय विजेंद्र सिंह ने कांस्य पदक जीतकर भारतीय मुक्केबाजी को नई दिशा दी थी। इसके बाद राष्ट्रमंडल खेलों और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भिवानी के खिलाड़ियों ने लगातार देश के लिए पदक जीते।

अब इस गौरवशाली परंपरा को महिला मुक्केबाज आगे बढ़ा रही हैं। जैस्मिन लंबोरिया और प्रीति साई पवार के अलावा साक्षी चौधरी, प्रिया घनघस जैसी खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं। इन खिलाड़ियों ने साबित किया है कि मुक्केबाजी में अब बेटियां भी देश की सबसे बड़ी उम्मीद बन चुकी हैं।

जैस्मिन लंबोरिया के कोच संदीप लंबोरिया का कहना है कि महिला मुक्केबाजी में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। पूजा रानी बोहरा जैसी खिलाड़ियों ने नई पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार किया और अब जैस्मिन, प्रीति, साक्षी और प्रिया जैसी बेटियां उस सफर को आगे बढ़ा रही हैं।

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में जैस्मिन और प्रीति की जीत ने भिवानी के खेल इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है। इन दोनों खिलाड़ियों के स्वर्ण पदकों ने यह संदेश दिया है कि भिवानी सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय मुक्केबाजी की ऐसी पाठशाला है जहां मेहनत, संघर्ष और जुनून से चैंपियन तैयार होते हैं।

आज भिवानी की गलियों से निकलने वाली बेटियां दुनिया के बड़े मंचों पर तिरंगा लहरा रही हैं। उनके गोल्डन पंच ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ‘मिनी क्यूबा’ की पहचान अभी भी कायम है और आने वाले समय में यह शहर भारत को और भी कई विश्व स्तरीय मुक्केबाज देने की क्षमता रखता है।

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