हरियाणा

IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले में आरोपी की जमानत खारिज

Kiran
31 Oct 2026 12:55 PM IST
IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले में आरोपी की जमानत खारिज
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हरियाणा लेबर वेलफेयर बोर्ड (HLWB) के एक कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले अकाउंट्स क्लर्क ने कथित तौर पर सिर्फ 50,000 रुपये की रिश्वत लेकर सरकारी फंड से 50 करोड़ रुपये की हेराफेरी करने में मदद की। पंचकूला की एक विशेष CBI अदालत ने उसे नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि शुरुआती जांच से पता चलता है कि वह इस कथित साजिश में सक्रिय रूप से शामिल था। यह हेराफेरी 657 करोड़ रुपये के IDFC फर्स्ट बैंक-AU स्मॉल फाइनेंस बैंक घोटाले का हिस्सा है। CBI के अनुसार, बचत खाता (savings account) खोलने की कोई मंजूरी न होने के बावजूद, अकाउंट्स क्लर्क अमित कुमार ने एक सह-आरोपी के कहने पर IDFC फर्स्ट बैंक में यह खाता खुलवाया। एजेंसी ने आगे बताया कि उसे अच्छी तरह पता था कि FDR (फिक्स्ड डिपॉजिट) बनाने के लिए बचत खाते की कोई जरूरत नहीं होती है। आरोप है कि उसने खाता खोलने के लिए जरूरी 'अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता' (authorized signatory) का मोबाइल नंबर और फोटो, IDFC फर्स्ट बैंक के पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर और सह-आरोपी अभय कुमार को व्हाट्सएप के जरिए भेज दिया था।
CBI ने अदालत को बताया, "यह मोबाइल नंबर सह-आरोपी अभिषेक सिंगला (अभय कुमार का साला) के नाम पर था। साथ ही, बैंक और बोर्ड के बीच होने वाली बातचीत और कॉल-बैक को छिपाने के लिए बोर्ड के नाम से एक फर्जी ईमेल आईडी भी बनाई गई थी।" यह भी सामने आया है कि 3 मार्च 2025 को IDBI बैंक को 50 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का एक पत्र भेजा गया था, जिसमें खाता संख्या (account number) खाली छोड़ दी गई थी। बाद में, 5 मार्च 2025 को शाम 5:50 बजे अभय कुमार ने व्हाट्सएप के जरिए खाता संख्या उपलब्ध कराई। यह पत्र 6 मार्च 2025 को IDBI बैंक पहुंचा। CBI ने कहा, "इस बैच के बाकी पत्रों पर डिस्पैच नंबर डिस्पैच क्लर्क ने हाथ से लिखा था, लेकिन सिर्फ इसी पत्र पर यह नंबर प्रिंट किया गया था। इससे पता चलता है कि यह पत्र डिस्पैच नंबर मिलने के बाद टाइप किया गया था।" इसी पत्र के आधार पर IDFC फर्स्ट बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर किए गए, जहाँ से लगभग 15 दिनों के भीतर धोखाधड़ी करके पैसे निकाल लिए गए।
आरोप है कि अमित कुमार ने बैंकों के साथ सारा संवाद ईमेल के जरिए किया, जबकि IDFC फर्स्ट बैंक के मामले में सारा संवाद व्हाट्सएप के जरिए हुआ और ईमेल से हुई बातचीत को रिकॉर्ड में नहीं रखा गया। आरोप है कि उसने व्हाट्सएप के जरिए अभय कुमार से एक फर्जी 'इंटरेस्ट सर्टिफिकेट' (ब्याज प्रमाण पत्र) हासिल किया और बोर्ड के खाते में उसे असली बताकर इस्तेमाल किया।
CBI का दावा है कि 6 मई 2025 को अमित कुमार को बैंक खाते के सटीक बैलेंस, FDR न होने और इस बात की जानकारी मिल गई थी कि अभय कुमार बैंक के कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं है। इसके बावजूद, उसने इस संवाद में कोई डायरी नंबर दर्ज नहीं किया और इसे कभी भी ऑफिस की फाइल में नहीं लगाया। उसने क्लर्क को निर्देश दिया था कि बैंक से आने वाले किसी भी पत्र को वरिष्ठ अधिकारियों के सामने ले जाने से पहले उसे दिखाया जाए। जांच में अमित कुमार और अभय कुमार के बीच इस पत्र को लेकर हुई बातचीत का भी पता चला। CBI ने कहा कि सब कुछ पता होने के बावजूद, उसने बचत खाता खोले जाने की जानकारी उच्च अधिकारियों को नहीं दी। साथ ही, अपराध को छिपाने के लिए उसने अपने फोन से अभय कुमार के साथ हुई व्हाट्सएप चैट को डिलीट कर दिया।
अभय कुमार के फोन से मिली चैट से पता चला कि अमित कुमार के खाते में 50,000 रुपये नकद जमा किए गए थे। अमित कुमार के वकील, यवनीत ढाकला ने अदालत को बताया कि चार्जशीट में उनके मुवक्किल पर लगाए गए आरोपों को अगर एक साथ भी देखा जाए, तो भी ये आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि अमित कुमार की अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों में भूमिका सीमित थी और उसके पास कोई भी फैसला लेने का स्वतंत्र अधिकार नहीं था।
IDFC फर्स्ट बैंक की ओर से पेश वकील, समीर सेठी ने CBI की दलीलों का समर्थन किया और जमानत अर्जी को खारिज करने की मांग की। बहस सुनने के बाद, CBI के विशेष न्यायाधीश विजयंत सहगल ने शुक्रवार (30 अक्टूबर) को कहा, “तथ्यों और परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए, कथित अपराध की गंभीरता और व्यापकता, तथा आवेदक की विशिष्ट भूमिका पर विचार करते हुए, यह अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि आवेदक (अमित कुमार) नियमित जमानत पाने के लिए कोई ठोस आधार नहीं रख पाए हैं। इसलिए, यह आवेदन खारिज किया जाता है।”
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