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राखीगढ़ी में हड़प्पा कालीन स्थल से मिली खोजों का अध्ययन कर रहे शोधकर्ता कई अहम पहलुओं की जांच कर रहे हैं। इनमें बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन के सबूत न मिलना, जनसंख्या में अभूतपूर्व उछाल, और हड़प्पा काल के अंतिम चरण के अवशेषों के DNA विश्लेषण के नतीजों का इंतजार शामिल है। लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) के वैज्ञानिक डॉ. नीरज राय ने 'द ट्रिब्यून' को बताया कि DNA विश्लेषण के आगे के नतीजे यह समझने में मदद कर सकते हैं कि 'स्टेप' (मध्य एशियाई घास के मैदानों) के पशुपालक पूर्वजों का इस क्षेत्र में कब आगमन हुआ और इसके बाद लोगों की आवाजाही कैसे हुई।
उन्होंने कहा, "हम DNA विश्लेषण के और नतीजों का इंतजार कर रहे हैं, ताकि यह पता चल सके कि 'स्टेप' के पशुपालक पूर्वज इस क्षेत्र में कब आए और बाद में लोगों की आवाजाही ने इसके आनुवंशिक इतिहास को कैसे आकार दिया।" डॉ. राय ने बताया कि खुदाई से पता चलता है कि लगभग 4,000 साल पहले राखीगढ़ी क्षेत्र में जनसंख्या में भारी उछाल आया था। उन्होंने कहा, "जनसंख्या वृद्धि का यह पैमाना असामान्य था। इतिहास में या आज की दुनिया में भी ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता। उस समय जोड़ों के औसतन 10 बच्चे होते थे और वे सभी जीवित रहते थे। उस दौर में प्लेग जैसी किसी बड़ी महामारी का भी कोई सबूत नहीं मिला है।" उन्होंने आगे कहा कि बड़े पैमाने पर इंसानी नुकसान करने वाली महामारियां लगभग 1000-800 ईसा पूर्व के आसपास आई थीं।
BSIP के वैज्ञानिक, जिन्होंने राखीगढ़ी की खुदाई पर काफी काम किया है, ने बताया कि यहां मिली चीजें एक सुविकसित बस्ती की ओर इशारा करती हैं, जो एक प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम करती थी। उन्होंने कहा, "लोथल एक छोटी बस्ती थी, लेकिन व्यापार और लोगों की आवाजाही का एक महत्वपूर्ण केंद्र थी। इसके विपरीत, राखीगढ़ी एक बड़ा रिहायशी इलाका रहा होगा, जहां लोग स्थायी रूप से बस गए थे।"
डॉ. राय ने कहा कि उपलब्ध सबूतों से पता चलता है कि लगभग 1800 ईसा पूर्व तक राखीगढ़ी से बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन नहीं हुआ था। उन्होंने इस सिद्धांत पर भी सवाल उठाया कि इस क्षेत्र में सिंधु घाटी सभ्यता का पतन सूखे के कारण हुआ था। उन्होंने कहा कि खुदाई में उस दौर में सूखे का कोई सबूत नहीं मिला है। उन्होंने कहा, "यहाँ पानी के स्रोतों - जैसे तालाबों और नदियों - की मौजूदगी के सबूत मिले हैं। साथ ही, यहाँ गेहूं और चावल की खेती भी होती थी। ये ऐसी चीजें हैं जिन्होंने इस इलाके में लोगों के बसने में मदद की होगी।" उन्होंने आगे कहा कि इस सिद्धांत की जांच करते समय कि क्या सूखे की वजह से लोग यहाँ से चले गए थे, इलाके में बारिश के पैटर्न पर भी गौर करना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इन नतीजों से पता चलता है कि यहाँ स्थानीय स्तर पर खेती होती थी। साथ ही, राखीगढ़ी से बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन करने का कोई सबूत नहीं मिला है। इसके अलावा, इस इलाके के प्राचीन लोगों का आधुनिक भारतीयों के पूर्वजों में भी योगदान रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अध्ययन से राखीगढ़ी के लोगों और दक्षिण भारत के लोगों (जिसमें तमिलनाडु का पिल्लयार समुदाय भी शामिल है) के बीच एक संबंध का संकेत मिलता है। उन्होंने बताया कि इस साल की शुरुआत में खुदाई के दौरान मिले DNA सैंपल संभवतः 'उत्तर हड़प्पा काल' (Late Harappan period) के हैं, जो मुख्य रूप से 1000-500 ईसा पूर्व के आसपास के हो सकते हैं। इन सैंपलों से इस इलाके में 'स्टेप' (Steppe) क्षेत्र से जुड़े लोगों के आने के बारे में और अधिक जानकारी मिल सकती है।
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