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पलवल में वैश्य अग्रवाल समुदाय ने सामाजिक आयोजनों में दिखावे के लिए होने वाले खर्चों पर लगाम लगाने के लिए शादियों में प्री-वेडिंग फोटोशूट, डीजे और शराब के स्टॉल पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके अलावा, समुदाय ने 'मृत्यु भोज' (तेरहवीं या शोक भोज) को भी खत्म करने और सादगीपूर्ण शादियों को बढ़ावा देने का फैसला किया है। ये फैसले रविवार देर शाम आयोजित समुदाय की एक महापंचायत में लिए गए, जिसमें पलवल, फरीदाबाद, गुरुग्राम और दिल्ली के सदस्य शामिल हुए। ऐसे रीति-रिवाजों को हतोत्साहित करने के लिए आठ प्रस्ताव पारित किए गए, जो अब केवल धन-दौलत के दिखावे और परिवारों पर आर्थिक बोझ का कारण बन गए हैं। महापंचायत ने शादी से पहले लड़का-लड़की के एक साथ बाहर जाने और प्री-वेडिंग फोटोशूट पर भी रोक लगा दी है।
यह कदम काफी अहम है, क्योंकि पलवल और उसके आसपास के इलाकों में अग्रवाल समुदाय (जिसमें वैश्य समाज भी शामिल है) में मुख्य रूप से अमीर व्यापारी रहते हैं और यह समुदाय भव्य शादियों के लिए जाना जाता है। हाल के वर्षों में, कई परिवारों ने महंगी 'डेस्टिनेशन वेडिंग' (बाहर जाकर शादी करना) का विकल्प चुना है। इस बैठक की अध्यक्षता मंच के संयोजक और पूर्व नगर पार्षद बलराम गुप्ता ने की। उन्होंने कहा कि कई रीति-रिवाज अब केवल धन-दौलत के दिखावे में बदल गए हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। प्रस्तावों के अनुसार, शादी समारोहों में तेज आवाज वाले डीजे की अनुमति नहीं होगी। बैंक्वेट हॉल के अंदर बजने वाला संगीत सरकारी नियमों के अनुसार तय ध्वनि सीमा के भीतर ही होना चाहिए। शादी के कार्यक्रमों में शराब के खुले स्टॉल लगाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए, परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या 21 से 31 के बीच सीमित कर दी गई है। अनावश्यक खर्चों और असुविधा से बचने के लिए, रात के बजाय दिन में फेरे और शादी करने को बढ़ावा दिया जाएगा। परिवारों को यह भी सलाह दी गई है कि वे महंगे निमंत्रण कार्ड, मिठाइयों और उपहारों की जगह व्हाट्सएप मैसेज और फोन कॉल का इस्तेमाल करें। शादी में दोनों पक्षों की ओर से आने वाले मेहमानों की कुल संख्या 300 से 400 के बीच सीमित रहेगी।
समुदाय ने 'मृत्यु भोज' को खत्म करने और अंतिम संस्कार के समय शव पर रखी जाने वाली चादरों की संख्या कम करने का भी फैसला किया है। शोक संतप्त परिवारों के पास जाने वाले लोग अब चादरों के बजाय नारियल, घी और कपूर जैसी जरूरी चीजें लेकर जाएंगे। शादी और बच्चे के जन्म के समय किन्नर समुदाय को दिए जाने वाले 'शगुन' की राशि अधिकतम 5,100 रुपये तय की गई है, जबकि होली और दिवाली के मौके पर यह राशि 500 रुपये होगी। गुप्ता ने कहा कि इसका उद्देश्य सादगी, समानता और सहयोग को बढ़ावा देना था। सदस्यों ने इन फैसलों को सबसे पहले अपने परिवारों में लागू करने का संकल्प लिया।
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