
चंडीगढ़। फसल अवशेष जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन ने अब तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया है। एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन (CAQM) के निर्देशों के बाद प्रशासन पराली जलाने की निगरानी के लिए ड्रोन तैनात करेगा। यह निगरानी व्यवस्था सितंबर से शुरू होगी और धान की कटाई पूरी होने तक लगातार जारी रहेगी।
प्रशासन के अनुसार, ड्रोन के माध्यम से खेतों में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं की रियल-टाइम निगरानी की जाएगी। इसका उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं की तुरंत पहचान करना और संबंधित क्षेत्रों में समय रहते कार्रवाई सुनिश्चित करना है। तकनीक आधारित निगरानी से प्रशासन को पहले की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से स्थिति पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
धान की कटाई का मौसम नजदीक आने के साथ ही पराली जलाने की समस्या को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और इसका असर आसपास के क्षेत्रों की हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है। ऐसे में प्रशासन ने इस बार निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की योजना बनाई है।
जानकारी के अनुसार, इस वर्ष जिले में करीब 2,70,000 एकड़ भूमि पर धान की विभिन्न किस्मों की खेती की जा रही है। धान की कटाई सितंबर के अंतिम सप्ताह से शुरू होने की संभावना है। कटाई के बाद खेतों में बचने वाले अवशेषों के उचित प्रबंधन के लिए किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है।
कृषि और किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में पिछले कुछ वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई है। विभाग के मुताबिक, वर्ष 2024 में खेतों में आग लगने के 17 मामले सामने आए थे, जबकि वर्ष 2025 में अब तक केवल दो मामले दर्ज किए गए हैं।
अधिकारियों का कहना है कि किसानों में जागरूकता बढ़ने और पराली प्रबंधन के विकल्प उपलब्ध होने के कारण घटनाओं में कमी आई है। प्रशासन की ओर से किसानों को फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें खेतों में मिलाने, मशीनों के इस्तेमाल और अन्य वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
ड्रोन निगरानी व्यवस्था लागू होने से प्रशासन को उन क्षेत्रों की पहचान करने में आसानी होगी, जहां पराली जलाने की संभावना अधिक रहती है। इसके अलावा, रियल-टाइम जानकारी मिलने से संबंधित विभाग तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित कर सकेंगे।
अधिकारियों ने बताया कि पराली जलाने की रोकथाम के लिए कृषि विभाग, जिला प्रशासन और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा रहा है। किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए आवश्यक जानकारी और सहायता उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने की समस्या को केवल कार्रवाई से नहीं, बल्कि किसानों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराकर ही स्थायी रूप से कम किया जा सकता है। इसके लिए आधुनिक कृषि उपकरणों, जागरूकता अभियान और आर्थिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं।
प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे पर्यावरण संरक्षण में सहयोग करें और फसल अवशेषों को जलाने से बचें। अधिकारियों का कहना है कि पराली प्रबंधन के लिए कई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं, जिनसे मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है और प्रदूषण भी कम होता है।
इस बार प्रशासन ने निगरानी के साथ-साथ रोकथाम पर भी विशेष ध्यान देने की योजना बनाई है। ड्रोन के अलावा स्थानीय स्तर पर टीमें भी सक्रिय रहेंगी, जो खेतों में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखेंगी।
CAQM के निर्देशों के तहत उठाया गया यह कदम वायु प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रशासन का लक्ष्य है कि इस सीजन में पराली जलाने की घटनाओं को न्यूनतम स्तर तक लाया जाए और किसानों को पर्यावरण अनुकूल खेती के लिए प्रेरित किया जाए।
पिछले वर्षों की तुलना में पराली जलाने के मामलों में आई कमी को प्रशासन सकारात्मक संकेत मान रहा है। अब ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी है, ताकि धान कटाई के दौरान खेतों में आग की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।





