
यमुनानगर। शहर को जलभराव की समस्या से निजात दिलाने के लिए शुरू की गई 11.84 करोड़ रुपये की महत्वपूर्ण जल निकासी परियोजना सात साल बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। वर्ष 2019 में शुरू हुई इस योजना के तहत नगर निगम की ओर से अब तक करीब 210 मीटर पाइपलाइन बिछाई जा चुकी है, जबकि लगभग 70 मीटर काम अभी भी अधूरा है। परियोजना को पूरा करने के लिए रेलवे को 5.27 करोड़ रुपये की राशि भी जमा करवाई जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद काम अंतिम चरण तक नहीं पहुंच पाया है।
परियोजना के अधूरे रहने का खामियाजा शहर के लोगों को हर बरसात में भुगतना पड़ रहा है। हल्की बारिश होते ही शहर की कई कालोनियों और निचले इलाकों में पानी भर जाता है। सड़कों और गलियों में जलभराव के कारण लोगों को आवागमन में परेशानी होती है। कई जगहों पर लोगों को पानी से होकर गुजरना पड़ता है। बारिश के बाद घंटों तक पानी जमा रहने से स्थानीय लोगों की परेशानी और बढ़ जाती है।
विडंबना यह है कि जिस परियोजना का उद्देश्य बारिश के पानी को शहर से बाहर निकालना और जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान करना था, उसी परियोजना का रास्ता पिछले सात वर्षों से अटका हुआ है। योजना में लगातार स्थान और तकनीकी अड़चनें सामने आती रहीं। कभी निजी जमीन परियोजना के रास्ते में बाधा बनी तो कभी सड़क के दूसरी तरफ से पाइपलाइन डालने की योजना बनाई गई। इसके बाद पीडब्ल्यूडी की जमीन से रास्ता निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन वहां भी मामला आगे नहीं बढ़ सका।
अब परियोजना को पूरा करने के लिए रेलवे लाइन के नीचे से पाइपलाइन डालने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए रेलवे से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। नगर निगम की ओर से रेलवे को 5.27 करोड़ रुपये जमा करवाए जाने के बावजूद काम शुरू होने में हो रही देरी लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
शहर में जलभराव की समस्या कोई नई नहीं है। बरसात के मौसम में कई क्षेत्रों में सड़कें पानी से भर जाती हैं। निचली कालोनियों के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण बारिश का पानी तेजी से बाहर नहीं निकल पाता। इससे सड़कों पर जलभराव के साथ-साथ घरों और दुकानों में भी पानी पहुंचने का खतरा बना रहता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष बरसात से पहले जलभराव से निपटने के लिए तैयारियों के दावे किए जाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हो सका है। यदि 11.84 करोड़ रुपये की परियोजना समय पर पूरी हो जाती तो शायद शहर के कई हिस्सों को जलभराव की समस्या से राहत मिल सकती थी। लोगों का सवाल है कि सात साल में परियोजना पूरी क्यों नहीं हो पाई और अब तक खर्च की गई राशि का अपेक्षित लाभ शहरवासियों को क्यों नहीं मिल रहा है।
परियोजना में देरी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। योजना के अनुसार पाइपलाइन के माध्यम से बारिश के पानी को शहर से बाहर निकालने की व्यवस्था की जानी थी। शुरुआत में निजी जमीन से पाइपलाइन निकालने की योजना बनी, लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण अड़चन पैदा हो गई। इसके बाद सड़क की दूसरी ओर से पाइप डालने का विकल्प तलाशा गया। जब यह रास्ता भी व्यवहारिक नहीं लगा तो पीडब्ल्यूडी की जमीन से पाइपलाइन निकालने की कोशिश की गई।
अब रेलवे लाइन परियोजना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। रेलवे लाइन के नीचे से पाइपलाइन डालने के लिए आवश्यक अनुमति और तकनीकी प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है। इसी कारण परियोजना का लगभग 70 मीटर हिस्सा अब भी अधूरा पड़ा है। नगर निगम द्वारा रेलवे को बड़ी राशि जमा कराने के बाद लोगों को उम्मीद है कि अब काम को गति मिलेगी और लंबे समय से अटकी परियोजना पूरी हो सकेगी।
बारिश के दौरान जलभराव का असर केवल आवागमन तक सीमित नहीं रहता। पानी जमा होने से सड़कें खराब होती हैं और वाहनों के आवागमन में भी दिक्कत आती है। लंबे समय तक पानी जमा रहने पर गंदगी और दुर्गंध की समस्या भी पैदा होती है। स्थानीय लोगों को आशंका रहती है कि जलभराव के कारण मच्छरों और अन्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
व्यापारियों के लिए भी जलभराव परेशानी का कारण बनता है। दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के सामने पानी भरने से ग्राहकों का आना-जाना प्रभावित होता है। वाहन चालकों को भी पानी से भरी सड़कों से गुजरना पड़ता है। कई बार जलभराव के कारण यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है और लोगों को वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ता है।
शहरवासियों की मांग है कि जल निकासी परियोजना को अब और लंबित न रखा जाए। रेलवे से जुड़ी औपचारिकताओं को जल्द पूरा कर करीब 70 मीटर बचे काम को तेजी से पूरा किया जाए। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की योजना का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब पूरी पाइपलाइन चालू होकर बारिश के पानी की निकासी सुनिश्चित करेगी।
सात साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद परियोजना का अधूरा रहना नगर निगम और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। परियोजना की राह में आने वाली अड़चनों का समय रहते समाधान किया जाता तो शहरवासियों को लंबे समय तक जलभराव की परेशानी नहीं झेलनी पड़ती।
अब निगाहें रेलवे लाइन के नीचे से पाइपलाइन डालने की प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि यह काम पूरा हो जाता है तो परियोजना का शेष हिस्सा भी पूरा होने की उम्मीद है। इसके बाद बारिश के पानी की निकासी का स्थायी इंतजाम होने से शहर के जलभराव प्रभावित क्षेत्रों को राहत मिल सकती है।
फिलहाल 11.84 करोड़ रुपये की यह परियोजना सात साल बाद भी अधूरी है और हर बारिश के साथ इसकी जरूरत और ज्यादा महसूस होती है। 210 मीटर पाइपलाइन बिछने तथा रेलवे को 5.27 करोड़ रुपये जमा होने के बावजूद करीब 70 मीटर काम बाकी है। अब जरूरत इस बात की है कि विभागीय अड़चनों को दूर कर परियोजना को जल्द पूरा किया जाए, ताकि यमुनानगर के लोगों को हर बरसात में जलभराव की समस्या से जूझने के लिए मजबूर न होना पड़े।





