गुजरात

पानी पहुंचा लेकिन गुणवत्ता पर सवाल CAG परीक्षण में करीब 89 प्रतिशत नमूने असफल

Kavita2
12 Sept 2026 11:22 AM IST
पानी पहुंचा लेकिन गुणवत्ता पर सवाल CAG परीक्षण में करीब 89 प्रतिशत नमूने असफल
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गांधीनगर। गुजरात विधानसभा में शुक्रवार को पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट में ग्रामीण पेयजल की गुणवत्ता को लेकर गंभीर तथ्य सामने आए हैं। ऑडिट के लिए चुने गए गांवों से लिए गए पानी के 88 नमूनों में से 78 नमूने स्वीकार्य सीमा के आधार पर पीने योग्य नहीं पाए गए। केवल 10 नमूने निर्धारित स्वीकार्य मानकों पर खरे उतरे। इस तरह जांचे गए नमूनों में असफल नमूनों का अनुपात 88.64 प्रतिशत रहा। रिपोर्ट के ये निष्कर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति के साथ उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की आवश्यकता सामने रखते हैं।

ऑडिट के दौरान 48 गांवों के 960 लाभार्थियों के बीच सर्वे भी किया गया था। हालांकि, लाभार्थियों के सर्वे और पानी के प्रयोगशाला परीक्षण के आंकड़े अलग-अलग हैं। करीब 89 प्रतिशत का आंकड़ा पानी के जांचे गए नमूनों से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सर्वे में शामिल 89 प्रतिशत लाभार्थियों के पानी की अलग-अलग जांच हुई थी। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से 88 नमूनों के परीक्षण और उनमें से 78 के स्वीकार्य सीमा पर खरे नहीं उतरने का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, जांच के लिए चयनित गांवों से पानी के नमूने एकत्र किए गए थे। परीक्षण में 10 नमूने, अर्थात 11.36 प्रतिशत, स्वीकार्य सीमा के आधार पर पीने योग्य पाए गए। शेष 78 नमूने इस कसौटी पर उपयुक्त नहीं मिले। आसान शब्दों में समझें तो जांचे गए प्रत्येक दस नमूनों में लगभग नौ स्वीकार्य मानकों पर असफल रहे। यह अनुपात पानी की गुणवत्ता की निगरानी को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है और परीक्षण के निष्कर्षों पर ध्यान देने की जरूरत बताता है।

इन आंकड़ों का दायरा समझना भी आवश्यक है। निष्कर्ष ऑडिट के लिए चुने गए गांवों और वहां से लिए गए नमूनों पर आधारित हैं। इन्हें पूरे गुजरात के सभी गांवों या प्रत्येक पेयजल स्रोत की स्थिति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। फिर भी चयनित नमूनों में इतनी बड़ी संख्या का स्वीकार्य सीमा से बाहर होना जांच के दायरे में आए क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे संबंधित जलापूर्ति व्यवस्था की गुणवत्ता और निगरानी का मूल्यांकन करने का आधार मिलता है।

रिपोर्ट में इस्तेमाल किया गया शब्द ‘स्वीकार्य सीमा’ भी विशेष महत्व रखता है। पानी के मानकों का मूल्यांकन करते समय किस सीमा और किन परीक्षण परिणामों के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है, यह देखना जरूरी होता है। उपलब्ध अंश में नमूनों के असफल होने का प्रतिशत दिया गया है, लेकिन प्रत्येक नमूने में किस तत्व या मापदंड की समस्या मिली, उसका विवरण नहीं है। इसलिए सभी नमूनों में एक ही तरह का प्रदूषण होने या किसी खास पदार्थ की अधिकता होने का दावा इन आंकड़ों से नहीं किया जा सकता।

पेयजल व्यवस्था का मूल्यांकन केवल पाइपलाइन बिछाने या घर तक पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं हो सकता। आपूर्ति की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता, दोनों अलग जिम्मेदारियां हैं। किसी स्थान पर पानी पहुंच रहा हो, तब भी उसके निर्धारित मानकों पर खरा उतरने की पुष्टि परीक्षण से ही होती है। सीएजी के निष्कर्ष इसी अंतर को सामने रखते हैं। ग्रामीण जलापूर्ति की सफलता समझने के लिए लाभार्थियों तक पहुंच और नमूनों की गुणवत्ता को साथ देखकर आकलन करना अधिक उपयोगी होगा।

लाभार्थियों का सर्वे और प्रयोगशाला परीक्षण इस प्रक्रिया में अलग प्रकार की जानकारी देते हैं। सर्वे से लोगों के अनुभवों और जलापूर्ति से जुड़ी परिस्थितियों का विवरण मिल सकता है, जबकि नमूनों की जांच पानी के मापदंडों का परिणाम देती है। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। इस मामले में 960 लाभार्थियों का उल्लेख सर्वे के आकार को बताता है और 88 नमूनों का आंकड़ा गुणवत्ता परीक्षण के आकार को। समाचार में इन दोनों संख्याओं का अंतर बनाए रखना जरूरी है।

रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने के बाद उसके निष्कर्ष सार्वजनिक जवाबदेही का आधार बने हैं। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जांच में असफल पाए गए नमूने किन स्थानों से लिए गए थे और वहां सुधार के लिए क्या कदम आवश्यक हैं। संबंधित विभाग की प्रतिक्रिया, दोबारा परीक्षण और सुधारात्मक उपायों की जानकारी से स्थिति अधिक स्पष्ट होगी। उपलब्ध विवरण में ऐसी कार्रवाई का उल्लेख नहीं है, इसलिए किसी नए आदेश, दंड या सुधार कार्यक्रम को घोषित तथ्य के रूप में नहीं बताया जा सकता।

इसी तरह इन परीक्षण परिणामों से किसी बीमारी के फैलने, लोगों के अस्पताल पहुंचने या स्वास्थ्य संबंधी नुकसान की संख्या का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए अलग प्रमाण और स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े आवश्यक होंगे। फिलहाल रिपोर्ट का ठोस निष्कर्ष इतना है कि चयनित गांवों से जांचे गए अधिकांश नमूने स्वीकार्य पेयजल मानकों पर खरे नहीं उतरे। यह तथ्य नियमित गुणवत्ता परीक्षण, परिणामों की स्पष्ट जानकारी और कमियों के समाधान की जरूरत को प्रमुखता से सामने लाता है।

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