गुजरात

जंगल के राजा पर बीमारी का संकट 62 शेर शेरनी और शावकों की मौत

nidhi
12 Sept 2026 10:07 AM IST
जंगल के राजा पर बीमारी का संकट 62 शेर शेरनी और शावकों की मौत
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एक साल में 62 शेरों की मौत के आंकड़े ने बढ़ाई चिंता

अहमदाबाद: एशियाई शेरों के एकमात्र प्राकृतिक आवास गुजरात से चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है। राज्य में एक साल के दौरान 62 शेर, शेरनियों और शावकों की बीमारी से मौत होने की जानकारी सामने आई है। इन मौतों के पीछे किडनी फेलियर, लकवा, गंभीर संक्रमण और अन्य बीमारियों को वजह बताया गया है। बड़ी संख्या में एशियाई शेरों की बीमारी से हुई मौत ने वन्यजीव संरक्षण और उनके स्वास्थ्य प्रबंधन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। गुजरात एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। गिर राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास के क्षेत्रों में इनकी सबसे बड़ी आबादी रहती है। पिछले कुछ वर्षों में शेरों की संख्या और उनका प्राकृतिक दायरा बढ़ा है, लेकिन इसके साथ बीमारियों, आपसी संघर्ष, दुर्घटनाओं और मानव गतिविधियों से जुड़े खतरे भी चुनौती बने हुए हैं।

किडनी फेलियर और लकवा जैसी बीमारियां
सामने आए आंकड़ों के अनुसार बीमारी से जान गंवाने वाले शेरों में अलग-अलग उम्र के नर-मादा और शावक शामिल हैं। कई शेरों में किडनी से संबंधित गंभीर समस्या सामने आई, जबकि कुछ मामलों में लकवा जैसी स्थिति और संक्रमण मौत की वजह बने। वन्यजीवों में बीमारी की पहचान कई बार शुरुआती चरण में मुश्किल होती है। जंगल में स्वतंत्र रूप से घूमने वाले शेरों के व्यवहार में बदलाव, भोजन छोड़ना या असामान्य गतिविधियां दिखाई देने के बाद ही स्वास्थ्य संबंधी समस्या का पता चल पाता है। गंभीर स्थिति में जानवर को रेस्क्यू कर उपचार केंद्र पहुंचाया जाता है।
शावकों की मौत भी चिंता का विषय
शावकों की मृत्यु वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जाती है। जन्म के शुरुआती महीनों में शावक संक्रमण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे में उनकी नियमित निगरानी और जरूरत पड़ने पर समय पर चिकित्सा सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है। वन विभाग शेरों के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए फील्ड स्टाफ, पशु चिकित्सकों और रेस्क्यू टीमों की मदद लेता है। बीमार या घायल शेर की सूचना मिलने पर उसे रेस्क्यू सेंटर ले जाकर उपचार करने की व्यवस्था भी मौजूद है।
गुजरात में बढ़ी है शेरों की आबादी
हालांकि मौतों के इन आंकड़ों के बीच एशियाई शेरों की कुल आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि भी दर्ज हुई है। वर्ष 2025 की गणना में गुजरात में एशियाई शेरों की संख्या 891 दर्ज की गई थी, जबकि 2020 में यह संख्या 674 थी। यानी पांच वर्षों में आबादी में लगभग 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। शेर अब केवल गिर राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं हैं। उनका विस्तार सौराष्ट्र के कई जिलों और तटीय इलाकों तक हुआ है। आबादी और क्षेत्र बढ़ने के साथ वन विभाग के सामने निगरानी का दायरा भी बड़ा हो गया है।
बीमारियों से बचाव बड़ी चुनौती
एशियाई शेरों की सीमित भौगोलिक आबादी होने के कारण किसी संक्रामक बीमारी का फैलना बड़ा खतरा पैदा कर सकता है। पूर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस जैसी बीमारियों को लेकर भी चिंता सामने आ चुकी है। इसलिए नियमित स्वास्थ्य निगरानी, टीकाकरण रणनीति, नमूनों की जांच और बीमार जानवरों को समय पर अलग करना महत्वपूर्ण माना जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ती आबादी के साथ शेरों के लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त शिकार, जल स्रोत और बेहतर पशु चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित करना जरूरी होगा। 62 शेरों की बीमारी से मौत का आंकड़ा यह संकेत देता है कि संरक्षण का लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरी आबादी को स्वस्थ और सुरक्षित बनाए रखना भी है।
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