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Gujarat गुजरात: गुजरात की पारंपरिक आदिवासी कला पिथोरा पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। इस उपलब्धि से राज्य के आदिवासी कलाकारों को नई पहचान मिलने के साथ-साथ उनकी कला और संस्कृति को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पिथोरा पेंटिंग गुजरात के आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी लोक कला परंपरा का हिस्सा रही है। खासतौर पर राठवा, भील और अन्य आदिवासी समुदायों के कलाकार इस कला को पीढ़ियों से आगे बढ़ाते आ रहे हैं। यह चित्रकला धार्मिक आस्था, प्रकृति, पशु-पक्षियों और जनजातीय जीवनशैली को दर्शाती है।
GI टैग मिलने के बाद अब पिथोरा पेंटिंग को आधिकारिक पहचान मिलेगी और इससे जुड़े कलाकारों को अपने उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग और बिक्री में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि GI प्रमाणन से नकली उत्पादों पर रोक लगाने में भी सहायता मिलेगी और असली कलाकारों को आर्थिक लाभ मिलेगा। पिथोरा कला में दीवारों और अन्य सतहों पर प्राकृतिक रंगों से विशेष चित्र बनाए जाते हैं। इन चित्रों में घोड़े, पेड़, देवी-देवताओं और सामाजिक जीवन से जुड़े प्रतीकों का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है। आदिवासी समाज में इसे शुभ अवसरों और धार्मिक अनुष्ठानों से भी जोड़ा जाता है।
गुजरात सरकार और कला से जुड़े संगठनों का मानना है कि GI टैग मिलने से आदिवासी कलाकारों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। इसके अलावा पर्यटन, हस्तशिल्प बाजार और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस कला की मांग बढ़ने की संभावना है। कलाकारों ने इस उपलब्धि को अपनी सांस्कृतिक विरासत की जीत बताया है। उनका कहना है कि इससे आने वाली पीढ़ियां भी इस पारंपरिक कला को सीखने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होंगी। पिथोरा पेंटिंग को GI टैग मिलना गुजरात की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और लोक कला के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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