
Gujarat गुजरात: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 2003 के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या हत्याकांड मामले में उम्रकैद की सज़ा काट रहे शूटर मोहम्मद असगर अली की सज़ा में छूट (रिमिशन) संबंधी याचिका पर छह महीने के भीतर निर्णय ले। कोर्ट का यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें समय से पहले रिहाई पर लंबे समय से लंबित फैसले को चुनौती दी गई थी।
मामले के अनुसार, मोहम्मद असगर अली, जो हैदराबाद का निवासी है, को 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पांड्या की गोली मारकर हत्या किए जाने के कुछ दिनों बाद गिरफ्तार किया गया था। इस हाई-प्रोफाइल मामले में उसे अदालत द्वारा दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में यह दलील दी कि वह पिछले कई वर्षों से जेल में सजा काट रहा है और उसने अब तक लगभग 14 वर्ष जेल में बिताए हैं। उसने अपनी याचिका में कहा कि उसका व्यवहार जेल में अच्छा रहा है और नियमों के अनुसार वह समय से पहले रिहाई के लिए पात्र है।
असगर अली ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार उसकी सज़ा में छूट और रिहाई से संबंधित आवेदन पर कोई निर्णय नहीं ले रही है, जिसके कारण उसकी याचिका लंबे समय से लंबित है। उसने अदालत से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि कानून के तहत उचित समय सीमा में निर्णय लिया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह इस याचिका पर निर्धारित समय सीमा के भीतर, यानी छह महीने के अंदर, निर्णय ले। अदालत ने कहा कि लंबित मामलों में अनावश्यक देरी न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है।
अदालत के इस निर्देश के बाद अब यह जिम्मेदारी राज्य सरकार पर होगी कि वह आरोपी की सजा में छूट की याचिका पर सभी कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले। इस प्रक्रिया में आरोपी के जेल रिकॉर्ड, व्यवहार और संबंधित कानूनी प्रावधानों की समीक्षा की जाएगी।
गौरतलब है कि हरेन पांड्या हत्याकांड गुजरात के सबसे चर्चित राजनीतिक मामलों में से एक रहा है। 2003 में हुई इस हत्या ने राज्य की राजनीति में बड़ा असर डाला था और लंबे समय तक इसकी जांच और सुनवाई चलती रही थी।
मामले में दोषी ठहराए गए मोहम्मद असगर अली ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि उसने जेल में अनुशासन बनाए रखा है और सुधारात्मक व्यवहार दिखाया है, इसलिए उसे कानून के तहत राहत दी जानी चाहिए।
अब इस मामले में सरकार के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह निर्णय न केवल इस विशेष कैदी की रिहाई से जुड़ा है, बल्कि सजा में छूट की प्रक्रिया और उसके समयबद्ध निपटारे को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।





