गोवा

सस्ती राजनीति का जरिया बना कब्रिस्तान का मुद्दा

Tara Tandi
6 Oct 2026 5:52 PM IST
सस्ती राजनीति का जरिया बना कब्रिस्तान का मुद्दा
x
मार्गाओ: 'मडगांवचो आवाज' और युवा नेता प्रभाव नाइक ने सोमवार को सवाल उठाया कि मुस्लिम समुदाय के लिए कब्रिस्तान का लंबे समय से लंबित मुद्दा 32 सालों में क्यों हल नहीं हुआ और यह मुद्दा सिर्फ़ चुनावों के दौरान ही सार्वजनिक चर्चा में क्यों आता है।
उन्होंने कहा कि चुनावों के दौरान मुस्लिम समुदाय से वादे तो किए गए, लेकिन चुनाव के बाद उन्हें भुला दिया गया।
नाइक ने कहा, "गोवा विधानसभा को दी गई जानकारी से पता चलता है कि यह वादा असल में कितना पुराना है। 1999 में, तत्कालीन मार्गाओ विधायक दिगंबर कामत ने गोवा विधानसभा में प्रस्ताव संख्या 26 पेश किया था, जिसमें मार्गाओ और उसके आसपास कब्रिस्तान के लिए पर्याप्त ज़मीन आवंटित करने की मांग की गई थी। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया था। रिकॉर्ड में पजीफोंड में 99,513 वर्ग मीटर ज़मीन और सर्वे नंबर 52, पीटी शीट नंबर 228 का भी ज़िक्र है।"
उन्होंने आगे कहा, "वादे तो होते रहे, लेकिन कब्रिस्तान नहीं बना। 2002 में फटोर्डा में ज़मीन का प्रस्ताव रद्द हो गया; 2006 में मौजूदा पजीफोंड कब्रिस्तान से सटी अतिरिक्त ज़मीन का प्रस्ताव आपत्तियों के कारण छोड़ दिया गया; और बाद में डावोरलिम में आया प्रस्ताव भी आगे नहीं बढ़ सका। अक्टूबर 2009 में, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने तत्कालीन मुख्यमंत्री दिगंबर कामत को पत्र लिखकर विधानसभा प्रस्ताव को लागू करने की मांग की थी।"
नाइक ने बताया कि इसके बाद सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत 'अर्जेंसी क्लॉज़' (तत्काल कार्रवाई का प्रावधान) लागू किया और 2010 में सोनसोडो में 30,191 वर्ग मीटर ज़मीन का अधिग्रहण शुरू किया; यह अधिग्रहण 2011 में पूरा हो गया। नाइक ने कहा, "फिर भी, 11 साल बाद भी कोई कब्रिस्तान नहीं बना। बॉम्बे हाई कोर्ट (गोवा बेंच) ने 12 अक्टूबर 2022 के अपने फैसले में इस लंबी विफलता का ज़िक्र किया, जबकि कब्रिस्तान की 'अत्यंत आवश्यकता' को स्वीकार किया गया था।" उन्होंने कहा, “हाई कोर्ट के दखल के बावजूद यह प्रोजेक्ट ज़मीन पर नहीं उतर पाया। GSUDA को 12 महीने का एक्सटेंशन इस भरोसे के साथ दिया गया था कि काम 27 नवंबर 2023 से शुरू हो जाएगा।
लेकिन 20 फरवरी 2024 को हाई कोर्ट ने फिर कहा कि ‘साइट पर कोई प्रगति नहीं हुई है’ और इसे ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया। विधानसभा के प्रस्ताव, इमरजेंसी क्लॉज़ के तहत ज़मीन अधिग्रहण, नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटीज के दखल और हाई कोर्ट के बार-बार दिए गए निर्देशों के बाद भी मारगाओ को सिर्फ़ वादे ही मिल रहे हैं। बत्तीस साल का समय काफ़ी है। मारगाओ को काम पूरा चाहिए, चुनाव के समय किए जाने वाले और वादे नहीं।”
Next Story