छत्तीसगढ़

ऐसी हरकत मतलब हाईकोर्ट को धमकाना, भड़क गए जज साहब

Nil dhankar
5 March 2026 2:34 PM IST
ऐसी हरकत मतलब हाईकोर्ट को धमकाना, भड़क गए जज साहब
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छग

बिलासपुर। एक मामले की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का वाकया अदालत को डराने की कोशिश है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जिला अदालत द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर हाई कोर्ट ने पूरे मामले को गंभीर मानते हुए दोनों आरोपितों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था।

सुनवाई पूरी होने के बाद हाई कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश को प्रकरण को दूसरी अदालत में ट्रांसफर करने के निर्देश दिए हैं। मामला बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के सिमगा स्थित न्यायालय में चल रहे एक चेक बाउंस प्रकरण से जुड़ा है। गजेंद्र सिंह के खिलाफ मामला विचाराधीन है। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलौदाबाजार ने हाई कोर्ट को भेजी शिकायत में बताया कि दोनों अभियुक्तों ने अदालत की कार्यवाही में व्यवधान डाला और पीठासीन अधिकारी को एक लिखित नोटिस थमा दिया।

नोटिस में न्यायाधीश के खिलाफ अपमानजनक, अभद्र और मानहानिकारक आरोप लगाए गए थे। सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे वाहन से पेट्रोल निकालकर सिमगा कोर्ट परिसर में आत्महत्या कर लेंगे। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने कहा कि आरोपियों के आचरण से यह प्रतीत होता है कि वे अदालत को डराने का प्रयास कर रहे हैं। उनके व्यवहार में किसी प्रकार का वास्तविक पश्चाताप नहीं दिखता। कोर्ट ने इसे न्यायालय की गरिमा के विपरीत बताया। हाई कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया है कि प्रकरण को जेएमएफसी कोर्ट से स्थानांतरित कर सुनवाई के लिए भेजा जाए, ताकि निष्पक्ष और निर्भीक वातावरण में न्यायिक प्रक्रिया जारी रहे।

अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अनुशासन और मर्यादा सर्वोपरि है। दायरा लांघने वालों को कड़ी चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा कि अदालत की कार्यवाही में व्यवधान और पीठासीन अधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है। बताया गया कि दो पक्षकारों ने कोर्ट परिसर में आत्महत्या करने की धमकी दी थी। इस पर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने दोनों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया। बाद में दोनों पक्षकारों ने निचली अदालत में लिखित रूप से खेद जताया। मौखिक रूप से उन्होंने तर्क दिया कि वे क्षमा मांग रहे हैं, माफी नहीं। उनका कहना था कि माफी गलती की मांगी जाती है, जबकि क्षमा बड़ों से।


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