स्मार्ट सिटी के नाम पर घोटाला, क्या संज्ञान लेंगे विभागीय मंत्री

पूर्व महापौर और अधिकारी हुए स्मार्ट और शहरवासी जोजवा
अत्याधुनिक सुविधा नहीं होने के कारण जवाहर बाजार के उपरी मंजिलों में कारोबार ठप
शहर के पहले अल्पसंख्यक प्रथम नागरिक बनाकर शहर की चाबी सौंपी वह निकला लुटेरा
अधिकारियों और पूर्व महापौर ने स्मार्ट शौचालय का पैसा अपने आप को स्मार्ट बनाने में लगाया
पूर्व महापौर रायपुर को स्मार्ट सिटी तो नहीं
बना सके और बिना काम के हुआ करोड़ों का घोटाला जरूर कर दिए
बूढ़ातालाब, चौक चौराहे चौड़ीकरण, एलईडी, लगाने के नाम पर हुआ घोटाला
अत्याधुनिक स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर बिना प्लानिंग के करोड़ों रूपये फूंक दिए
सरकारी फंड को कैसे लूटना है कांग्रेसियों से पूछ लो जो उच्चपद पर रहकर लूटे हैं
रायपुर (जसेरि)। कांग्रेस के कार्यकाल को घोटाला, भ्रष्टाचार के लिए याद किया जाएगा। कांग्रेस के कार्यकाल में पूर्व महापौर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए स्मार्ट सिटी के अंतर्गत बूढ़ा तालाब सौंदर्यीकरण के नाम पर घटिया फाउंटेन, चौक चौराहे का सौंदर्यीकरण और जवाहर बाजार मार्केट के नाम पर जमकर घोटाला किया। रायपुर शहर की सबसे महत्वपूर्ण मालवीय रोड स्थित जवाहर बाज़ार जो पुराना सब्ज़ी बाज़ार व फ्रूट बाज़ार के रूप में प्रख्यात था उसको तोडकर नया जवाहर बाज़ार बनाने की महत्वाकांक्षी योजना रायपुर शहर के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक थी, वह अब बनकर तैयार भी हो गया है लेकिन अभी तक पूरी दुकानें बिकी नहीं है।
मजे की बात पूर्व महापौर द्वारा इस कॉम्प्लेक्स में दुकानों को मनमाने ढंग से भी अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को दिए जाने की शिकायत की खबर जनता से रिश्ता लगातार प्रकाशित करते आ रहा है लेकिन विभागीय मंत्री और अधिकारी खामोश बैठे हुए हैं जबकि उनको खबर को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। रायपुर की जनता को स्मार्ट सुविधा देने के नाम पर करोड़ रूपया खर्च हो गया औऱ जनता उसका उपयोग न करें तो इस सुविधा का क्या औचित्य था। अधिकारियों ने अपनी मनमानी का जो हठधर्मिता दिखाया उसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। इस तरह के स्मार्ट शौचालय का क्या औचित्य था करोड़ों रुपए बर्बाद हो गए शौचालय सील पैक कर दिया गया। अरबों रुपए खर्च कर राजधानी रायपुर को स्मार्ट टायलेट बनाने की कवायद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, जिसे छुपाने के लिए अब शहर में सार्वजनिक स्थलों में बनाए गए स्मार्ट टायलेट में खामियों के चलते उसे बंद कर दिया गया है। जब खामी थी तो शुरू क्यों किया गया यह भी गंभीर सवाल है।जनता के पैसों का किस तरह बर्बाद करते है इसका नमूना रायपुर में बनाए गए स्मार्ट टायलेट को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। निगम में अरबों रुपए के फंड को देखकर स्मार्ट सिटी नामक कंपनी बनाकर स्मार्ट काम सडक़ गार्डन, तालाब के स्कूल के सौंदर्यीकरण के साथ जनता को सुविधा देने के नाम पर पांच साल तक लूट मचाया। अब निगम में सत्ता बदलने के साथ अपने काले कारनामे छुपाने के लिए सारे स्मार्ट शौचालय को बंद कर सुनियोजित पर्दा डाल दिया है ताकि कोई इस मामले को मुद्दा न बना सके और अधिकारियों के काले कारनामे हमेशा के लिए दफन हो जाए।अब सभी स्मार्ट शौचालय को टीना और ग्रिल लगाकर सील पैक कर दिया गया। अब सवाल उठता है कि जब इसका उपयोग होना ही नहीं था और तो इसका निर्णाण क्यों किय़ा गया। क्या सरकारी धन को इसी तरह बर्बाद करना स्मार्ट सिटी का आइडिया है। स्मार्ट का उपयोग जनता नहीं कर सकती ये कैसा स्मार्टनेस है।
मालवीय रोड में लेआउट किसे लाभ पहुंचाने बदला गया बदलकर काम किया
अधिकारियों और पूर्व महापौर ने मिलीभगत कर जवाहर बाजार स्थित काम्प्लेक्स को नियम विरुद्ध लेआउट बदल कर काम किया गया जबकि लेआउट बदलने का आधिकार सिर्फ राज्य शासन को ही है वह भी डाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग के नक़्शे के अनुसार प्लानिंग मार्केट की समुचित पार्किंग और आने जाने के लिए मार्ग, सिढ़ी, लिफ्ट एसक्लीलेटर को बिना नुकसान पहुंचाए तभी संभव हो सकता है। लेकिन जवाहर बाजार के प्रकरण में सभी नियम को ताक में रखते हुए निमय विपरीत अवैध दुकानों का निर्माण किया गया। मालवीय रोड स्थित जवाहर बाज़ार का लेआउट किसके इंतज़ार में बदला गया लेआउट बदलने के लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से उन प्रस्ताव राज्य शासन हो जाता है लेकिन जवाहर बाज़ार के लिए और बदले में ऐसा नहीं हुआ जहाँ पब्लिक के लिए एक्सेलेटर लगना था वहां पर तीन दुकान अतिरिक्त निर्माण किया गया फिर वही तीन दुकान को अपने रिश्तेदार के नाम पर आबंटित कर दिया गया है भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण कहीं और हो नहीं सकता। जीता जागता पुख्ता प्रमाण के तौर पर दुकान आज दिख रही है।
सरकार से उम्मीद
भाजपा सरकार आने के बाद जनता को उम्मीद थी कि कांग्रेसियों के कथित भ्रस्टाचार की जाँच होगी लेकिन जानत मायूस हो गई। पूर्व महापौर के रिश्तेदार की दुकानों को निरस्त किया जाएगा और उच्च स्तरीय जाँच कराकर शासन और नगर निगम अलग अलग तरह की जाँच कर पूर्व की महापौर या जो भी अधिकारी उक्त भ्रष्टाचार में लिप्त होगा को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए लेकिन दो साल होने को है पूर्व महापौर के खिलाफ़ किसी भी प्रकार की जाँच नगर निगम या राज्य सरकार ने संज्ञान लेकर अभी तक शुरू नहीं की जो एक चर्चा का विषय है। नगर निगम में भ्रष्टाचार के लिए बदनाम कांग्रेस के पूर्व महापौर के कारण कांग्रेस पार्टी रायपुर की चारों सीटों के अलावा पूरे प्रदेश में तो बदनामी के कारण हार का सामना करना पड़ा। दूसरा भ्रष्टाचार का प्रकरण फायर स्टेशन गायब उसी प्रकार पूर्व महापौर ने रायपुर शहर के फ़ायर स्टेशन जो फ़ायर ब्रिगेड चौक परस्थिति को तोडकऱ नया निर्माण अपने कार्यकाल में कराया वो भी नियम विपरीत लिए ले आउट को बदला गया और जहाँ पर शहर के लिए आगजनी से बचाव के लिए आम जनता सुविधा हेतु फ़ायर ब्रिगेड का अमला और फ़ायर ब्रिगेड की गाडिय़ां हमेशा 24 घंटे तैनात रहती है शहर की जनता के लिए सुरक्षा के लिए अति आवश्यक सेवा में से एक है जो होना अनिवार्य था लेकिन भ्रष्टाचार के चरम सीमा को पार करते हुए पूर्व महापौर ने फ़ायर स्टेशन को वहाँ से जिस पर गाड़ी रखने की जगह हेतु लेआउट में सुरक्षित रखा गया था उसको बदल कर वहां पर अपने रिश्तेदार के लिए जगह बना ली है और कैफे और जिम खोला गया।नियम विपरीत फ़ायर स्टेशन को विलोपित कर जिम बनाना ग़ैरक़ानूनी ढंग से निर्माण कर अपने रिश्तेदार को आबंटित करना जैसे यह अपराध भ्रष्टाचार की चरम सीमा को पार करते हैं।
देखा जा रहा है कि पिछले कुछ सालों से रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम तरह-तरह के छल प्रपंच किया गया. इसका एक फायदा यह हुआ कि रायपुर भले ही स्मार्ट न हुआ हो लेकिन अधिकारियों औऱ पूर्व सत्ताधारी काबिज पार्टी की छवि जरूर स्मा्र्ट हो गई। स्मार्ट सिटी के नाम पर लूट की छूट का फायदा अधिकारियों ने भऱपूर उठाया । स्मार्ट सिटी द्वारा निर्मित स्मार्ट शौचालय जो रायपुर शहर में कबाड़ बन चुके हैं ये तो सिर्फ एक नमूना है ऐसे कई घोटाले हैं।
तत्कालीन महापौर ने स्मार्ट सिटी के अधिकारियों के साथ मिलकर इतना बड़ा कारनामा कर करोड़ की लूट जनता के पैसे की कर डाली। स्मार्ट सिटी के नाम पर कहीं पर भी शौचालय का निर्माण बिना सोचे समझे सिर्फ निगम के पैसों को वाट लगाने का तरीका अपनाया। ताकि जल्द से जल्द स्मार्ट सिटी के अधिकारी और तत्कालीन भ्रष्ट महापौर को तत्काल ठेकेदार से कमीशन मिल सके । अनाप-शनाप कहीं भी स्मार्ट सिटी की योजनाओं के नाम पर पैसा बर्बाद किया गया। इसका जीता जागता उदाहरण के स्मार्ट शौचालय जो सील पैक होकर बंद पड़े है। आखिर बंद करने का निर्णय किसने लिया और क्यों लिया। स्मार्ट शौचालय आखिर बनाया ही क्यों था?





