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मूक दर्शक बनकर सरकार का सफेद हाथी साबित हो रहा है रेरा.
जब रेरा की जगह बिल्डर फैसला लेंगे तो मकान-बंगला खरीदने वालों को बिल्डर चूना लगाएंगे ही
रेरा में वही होता है जो बिल्डर चाहता है, रेरा के गठन और निर्णयों पर उठने लगे है सवाल
जमीन दलाल रेरा के लायसेंस के बिना दलाली कर रहे हैं जो गैरकानूनी है, इसकी तहत एक साल तक की जेल की सजा है
रायपुर: रेरा का गठन सरकार ने बिल्डरों पर अंकुश लगाने के साथ आम जनता को उनके बजट के हिसाब से मकान फ्लेट मिल सके। जिसका नियंत्रण रेरा के पास होने के बाद भी मूक दर्शक बनकर सरकार का सफेद हाथी साबित हो रहा है। अपना खुद का मकान आम लोगों का सपना होता है अपनी जिदंगी भर की कमाई मकान खरीदने में लगा देते है । लेकिन शातिर बिल्डरों के चक्क्रर में आकर अपना सब कुछ लुटा कर रेरा की शरण में चले जाते है और वहां वहीं होता है जो बिल्डर चाहता है। एसे में रेरा के गठन और रेरा के निर्णयों पर सवाल उठना लाजिमी है।
ताजा मामला राजधानी में अवैध प्लाटिंग के खिलाफ कई बिल्डरों रेरा की ओर से सख्ती फिलहाल नोटिस तक सीमित हो कर रह गई है। शहर के आसपास सौकड़ों एकड़ कृषि भूमि को छोटे -छोटे टुकड़ों में काट कर बेचने का खेल भू-माफियाओं ने शुरू कर दिया है। लेकिन रेरा के नोटिस वाली कार्यशैली से सरकार की बदनामी हो रही है।
राजधानी के आसपास अवैध प्लाटिंग जोरों पर है आउटर में जिधर देखो अंधाधुंध प्लाटिंग की जा रही है। मोती नगर मस्जिद के आसपास कमलविहार से लगे भूमि में बिना लेआउट और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग में बिना जानकारी दिए धड़ाधड़ बेखौफ प्लाटिंग की जा रही है। जमीन दलाल टाइप के लोग अपने कमीशन के लालच में भोलेभाले िकसानों की जमीन औने पौने बाव में खरीद कर लोगों को अवैध प्लाटिंग के जान में फंसा रहे है और अपना दलाली लेकर मुँह काला कर रहे हैं । अब बेचारा खरीदार निगम और अन्य सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहता है। वहीँ रेरा भी इस मामले में पूरी तरह से भू-माफियाओ के चंगुल में फंसा नजऱ हुआ है रि़श्वत के रूप में टेबल के नीचे से मिलने वाला लिफाफा लोगो के साथ न्याय नहीं होने दे रहा है। फ्लाट खरीदने वाले बिल्डर के चंगुल में फंस कर अपने आपको ठगा सा ंहसूस कर रहे है। किसी भी तरह के कायदे कानून इन बिल्डरो पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। िबल्डर अब आदमखोर की तरह हो चुके है। पर निगम की कार्रवाई ने बिल्डरों के अंधा कानून से घर खरीदने वालों को बचाने वाली सरकारी संस्था रेरा अपने कानून कायदे से को तोड़ मरोड़ कर बिल्डरों को बचाने में लगी हुई है।
रेरा के हाथ-पैर फूल रहे
बिल्डरों पर कार्रवाई करने और उनके अंधा कानून से घर खरीदने वालों को बचाने वाली संस्था रेरा के हाथ पांव फूल रहे है। उसके पीछे रेरा के ही तथाकथित अधिकारी-कर्मचारी है जो बिल्डरों के लिए काम करते है। उसके कानून कायदे बिल्डरों के फेवर वाले बना दिए गए है। छत्तीसगढ़ सरकार ने एक नीतिगत व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए रेरा का गठन किया था ताकि घर का सपना देखने वालों का खुद का घर हो सके। जिसमें पूरी पारदर्शिता के साथ मकान फ्लैट खरीदने वालों को बिल्डरों की तथाकथित लीपापोती से लब्बोलुवाब से बचाया जा सके. रेरा ने कई बिल्डरों को उनके ब्रोशर में दिखाए गए घर और घर खरीदने वाले खरीददारों को सौंपे घर में जमीन प्लाट में जमीन आसमान का अंतर पाया जा रहा है। जिसकी शिकायत सही पाए जाने के बाद भी रेरा उन बिल्डरों का प्रोजेक्ट रद्द् करने के बजाय अर्थदंड और नोटिस देकर उनका हौसला अफजाई करते नजर आ रहा है।
बिल्डरों का अपना अलग कानून
जिसके कारण राजधानी के हजारों बिल्डरों के खिलाफ रेरा में शिकायत दर्ज होने के बाद भी उनके सेहत पर कोई फर्क दिखाई नहीं दे रहा है। राजधानी सहित प्रदेश भर में बिल्डरों ने रेरा के कानून कायदे को अपने हिसाब से संशोधन करवा कर मकान, प्लाट फ्लेट खरीदने वालों को चूना लगाने का लाइसेंस समझ बैठे है। रेरा में नियम कायदे का पालन नहीं कर रहा है। कोई भी सरकारी जमीन घासभूमि पर लोगों को पहले कब्जा करवाते है फिर राजनीतिक सोर्स का फायदा उठाते हुए उस घास भूमि को अपने व्यवसायिक प्रयोजन के लिए किसी नेता के समर्थक के नाम आवंटित कराते है उसके बाद उस बहुमंजिला फ्लेट तान कर मनमाना दाम में बेचते है। अब तो बिल्डरों ने सरकारी भूमि पर ही कब्जा कर उसे अपने प्रोजेक्ट में शामिल कर लिए है।
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