छत्तीसगढ़
चुनाव आयोग पर सियासी घमासान, नवीन चावला का मामला फिर चर्चा में
Shantanu Roy
15 Oct 2026 7:14 PM IST

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छग
Raipur. रायपुर। देश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच वर्ष 2009 का नवीन चावला प्रकरण एक बार फिर चर्चा में आ गया है। रायपुर से 15 अक्टूबर 2026 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए विपक्ष पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाया गया है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश की थी, तब यूपीए सरकार ने उसे स्वीकार नहीं किया था। अब वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की मांगों को लेकर उसी घटनाक्रम का हवाला दिया जा रहा है। एडवोकेट और भाजपा नेता नरेश गुप्ता ने विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी है।
2009 में नवीन चावला को हटाने की हुई थी सिफारिश
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने राष्ट्रपति को एक रिपोर्ट भेजकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश की थी। गोपालास्वामी ने चावला की निष्पक्षता और उनके कथित राजनीतिक संबंधों को लेकर सवाल उठाए थे। उन पर आयोग की गोपनीय जानकारियां कांग्रेस नेताओं के साथ साझा करने के आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि, ये आरोप विवादित थे और इन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
यूपीए सरकार ने खारिज की थी सिफारिश
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन यूपीए सरकार ने एन. गोपालास्वामी की सिफारिश को अस्वीकार कर दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह, संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित न्यायिक निर्णयों पर विचार करने के बाद नवीन चावला को हटाने की सिफारिश खारिज की थी। यह फैसला 1 मार्च 2009 को सार्वजनिक हुआ था। इसके बाद नवीन चावला ने 21 अप्रैल 2009 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।
आपातकाल और शाह आयोग की टिप्पणियों का उल्लेख
प्रेस विज्ञप्ति में नवीन चावला के प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि वर्ष 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान चावला दिल्ली प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे। आपातकाल के बाद गठित शाह आयोग की टिप्पणियों का हवाला देते हुए उनके प्रशासनिक आचरण पर उठे पुराने सवालों को याद दिलाया गया है। इसके अतिरिक्त चावला और उनके परिवार से संबंधित ट्रस्टों को भूमि आवंटन तथा वित्तीय सहायता मिलने के आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। ये आरोप उस समय राजनीतिक विवाद का विषय रहे थे।
कांग्रेस पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप
विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए नवीन चावला के खिलाफ तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश का समर्थन नहीं किया, लेकिन वर्तमान में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं के संबंध में राजनीतिक दलों का रुख सरकार और विपक्ष में उनकी स्थिति के आधार पर अलग नहीं होना चाहिए। हालांकि, 2009 में नवीन चावला को लेकर उठे आरोप और वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध उठाए जा रहे सवाल अलग-अलग घटनाक्रम हैं। दोनों का मूल्यांकन संबंधित तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर भी विवाद
वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर आपत्तियां जताई हैं। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग भी उठाई है। वहीं, भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर फिर छिड़ी बहस
इस राजनीतिक विवाद ने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही पर बहस को फिर सामने ला दिया है। संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग से संबंधित प्रावधान हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा उन्हें पद से हटाने की अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। 2009 के घटनाक्रम और वर्तमान राजनीतिक विवाद के बीच प्रेस विज्ञप्ति ने कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। वहीं, विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कर रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और राजनीतिक आरोपों का तथ्यात्मक परीक्षण महत्वपूर्ण बना हुआ है।
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