छत्तीसगढ़

मंत्री से ज्यादा 'पावरफुल' PA!

jantaserishta.com
31 Aug 2026 11:13 AM IST
मंत्री से ज्यादा पावरफुल PA!
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छत्तीसगढ़.
खाद्य मंत्री के बंगले में संतोष अग्रवाल की दरबारी राजनीति की चर्चा
संगठन से विभाग तक बढ़ी नाराजगी, कार्यकर्ताओं का दावा मंत्री तक पहुंचने से पहले फिल्टर करता है पीए
रायपुर (जसेरि)। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में मंत्रियों के निज सचिवों और ओएसडी की कथित पावर पॉलिटिक्स को लेकर उठते रहे सवालों के बीच अब खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल के निज सचिव संतोष अग्रवाल को लेकर भाजपा के भीतर ही चर्चाओं का बाजार गर्म है। पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर एक निज सचिव के पास ऐसी कौन सी राजनीतिक कला है कि मंत्री के बंगले से लेकर खाद्य विभाग के गलियारों तक उसकी सक्रियता की चर्चा होने लगी है। मंत्री दयाल दास बघेल की पहचान भाजपा में सहज, सरल और कार्यकर्ताओं के बीच आसानी से उपलब्ध रहने वाले नेता की रही है, लेकिन उनके निज सचिव की कथित कार्यप्रणाली को लेकर इसके उलट शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। भाजपा से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि मंत्री तक पहुंचने वाले नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं पर नजर रखी जाती है और किससे मंत्री की क्या बातचीत हुई, इसका हिसाब रखने की कोशिश होती है। हालांकि इन आरोपों पर निज सचिव या मंत्री की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
'मंत्री के कान तक कौन सी बात पहुंचे, इसका ठेका किसके पास?
भाजपा के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि मंत्री और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद को आखिर कौन नियंत्रित कर रहा है? पार्टी के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर दावा किया कि प्रदेश संगठन का कोई पदाधिकारी अथवा क्षेत्र का कार्यकर्ता जब मंत्री से मिलने पहुंचता है तो निज सचिव की निगाह पूरी मुलाकात पर बनी रहती है। आरोप यह भी है कि कई बार मंत्री के सामने किसी व्यक्ति को लेकर बनाई गई धारणा बाद की राजनीतिक दूरी का कारण बन जाती है। इसी वजह से कुछ कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि मंत्री तक पहुंचने के लिए अब राजनीतिक पहचान से ज्यादा 'बंगले की अनुमतिÓ महत्वपूर्ण होती जा रही है। यह स्थिति सही है तो सवाल बेहद गंभीर है क्या मंत्री का कार्यालय कार्यकर्ताओं और जनता के लिए खुला मंच है या फिर एक निज सचिव के प्रभाव का 'फिल्टर सिस्टमÓ?
कार्यकर्ताओं में फुसफुसाहट- आखिर इतनी पकड़ कैसे?
भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि संतोष अग्रवाल ने मंत्री के कार्यालय में अपनी ऐसी पकड़ बना ली है कि विभागीय अधिकारियों से लेकर पार्टी के लोगों तक उनकी सक्रियता महसूस की जा रही है। कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि मंत्री से मिलने आने वाले लोगों के बारे में जानकारी रखने और मुलाकात के बाद उसकी राजनीतिक व्या या करने की प्रवृत्ति ने असहजता पैदा की है। मंत्री बंगले में कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों और समर्थकों द्वारा निज सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताए जाने की भी चर्चा है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो संगठन स्तर पर इसकी समीक्षा क्यों नहीं हो रही?
बचकर रहना... वाली कथित सलाह भी चर्चा में
मंत्री के बंगले से जुड़े सूत्रों के हवाले से एक कथित पुराना राजनीतिक प्रसंग भी इन दिनों चर्चा में है। बताया जाता है कि प्रदेश के एक पूर्व मंत्री और वर्तमान रायपुर विधायक ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंत्री दयाल दास बघेल के साथ उनके निज सचिव संतोष अग्रवाल को देखकर कथित तौर पर मंत्री को उनसे सावधान रहने की सलाह दी थी। भाजपा के भीतर इस कथित टिप्पणी की चर्चा अब इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि निज सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर मौजूदा समय में भी पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं।
130 करोड़ के गुड़ टेंडर ने भी खड़े किए थे सवाल
खाद्य विभाग से जुड़े करीब 130 करोड़ रुपये के गुड़ खरीदी टेंडर का मामला भी अब निज सचिव को लेकर चल रही चर्चाओं के साथ जोड़ा जा रहा है। टेंडर की दरों और प्रक्रिया को लेकर मीडिया में सवाल उठने के बाद अंतत: टेंडर निरस्त करना पड़ा था। इस पूरे मामले को लेकर विभाग की कार्य प्रणाली पर सवाल उठे और राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं चलीं। कुछ लोगों ने खरीदी प्रक्रिया में बड़े वित्तीय नुकसान अथवा अनियमितता की आशंका जताई थी, हालांकि किसी घोटाले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने बड़े टेंडर की प्रक्रिया में यदि सब कुछ पारदर्शी था तो उसे निरस्त करने की नौबत आखिर क्यों आई?
ओएसडी हटाए, अब पावरफुल पीए पर कब नजर?
भाजपा सरकार बनने के बाद मंत्रियों के कार्यालयों में पदस्थ ओएसडी और निज सचिवों की भूमिका को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं। संगठन स्तर पर राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और मंत्री केदार कश्यप समेत कुछ मंत्रियों के कार्यालयों में पदस्थ लोगों को हटाने की कार्रवाई भी की गई थी। इसके बाद यह संदेश देने की कोशिश हुई थी कि सरकार में मंत्री के नाम पर कोई समानांतर सत्ता केंद्र स्वीकार नहीं किया जाएगा। लेकिन खाद्य मंत्री के निज सचिव को लेकर उठ रही चर्चाओं ने इस पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है।
संगठन के लिए भी चुनौती-मंत्री की छवि पर पड़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी मंत्री के कार्यालय में पदस्थ निज सचिव की भूमिका महज व्यक्तिगत सहायक तक सीमित नहीं रहती। वह अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं और आम लोगों के साथ मंत्री के संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। ऐसे में यदि उसी माध्यम को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार बढ़ती है तो उसका सीधा असर मंत्री की राजनीतिक छवि पर पड़ना स्वाभाविक है। खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल अनुभवी भाजपा नेता हैं और संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंत्री की सहजता पर उनके निज सचिव की कथित 'दरबारी राजनीतिÓ भारी पड़ रही है या नहीं?
अब गेंद संगठन के पाले में
भाजपा नेतृत्व पहले भी मंत्रियों के कार्यालयों में पावर सेंटर बनने की शिकायतों पर कार्रवाई कर चुका है। ऐसे में खाद्य मंत्री के निज सचिव को लेकर उठ रही चर्चाओं की यदि शिकायतें संगठन तक पहुंचती हैं तो अब देखना होगा कि नेतृत्व इसे महज राजनीतिक कानाफूसी मानकर नजरअंदाज करता है या फिर पूरे मामले की पड़ताल कराता है। क्योंकि सवाल सिर्फ एक निज सचिव की कार्यप्रणाली का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी मंत्री के बंगले में बैठा एक व्यक्ति इतना प्रभावशाली हो सकता है कि मंत्री और उन्हीं के कार्यकर्ताओं के बीच दूरी पैदा होने लगे? अगर यह धारणा गलत है तो उसका खंडन होना चाहिए, और यदि शिकायतों में दम है तो भाजपा संगठन को समय रहते इस पावर सेंटर पर नजर डालनी होगी।
दिल्ली वाले मांग रहे रिपोर्ट
बताया जाता है की छत्तीसगढ़ को लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व को लगातार शिकायतें मिल रही थी जिसमे अधिकतर मंत्रियों की पीए की कारगुजारी रही है, इसके बाद कई मंत्रियों के निजी सचिवों और ओएसडी की छुट्टी भी की गई थी। जिसके बाद ही केंद्रीय नेतृत्व द्वारा मंथन की योजना बनी थी और सभी छोटी बड़ी जानकारी दिल्ली भेजी जाने लगी थी। संगठन महामंत्री अजय जामवाल ने पिछले दिनों मंत्रियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने पर नाराजगी जताई थी साथ ही अच्छे परफारमेंस के लिए गजेंद्र और श्याम बिहारी के कामकाज की सराहना भी की थी।
सत्ता और संगठन के बीच समन्वय मजबूत करने के लिए हुई भाजपा की दो दिवसीय बैठक में कई जिलाध्यक्षों ने प्रभारी मंत्रियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। इसके आलावा गजेंद्र और श्याम बिहारी के कामकाज की सराहना भी हुई। दो दिवसीय बैठक में शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को लेकर कोई शिकायत सामने नहीं आई। गजेंद्र यादव के पास राजनांदगांव जिले का प्रभार है।
मंत्री और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद को आखिर कौन नियंत्रित कर रहा
भाजपा के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि मंत्री और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद को आखिर कौन नियंत्रित कर रहा है? पार्टी के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर दावा किया कि प्रदेश संगठन का कोई पदाधिकारी अथवा क्षेत्र का कार्यकर्ता जब मंत्री से मिलने पहुंचता है तो निज सचिव की निगाह पूरी मुलाकात पर बनी रहती है। आरोप यह भी है कि कई बार मंत्री के सामने किसी व्यक्ति को लेकर बनाई गई धारणा बाद की राजनीतिक दूरी का कारण बन जाती है। इसी वजह से कुछ कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि मंत्री तक पहुंचने के लिए अब राजनीतिक पहचान से ज्यादा 'बंगले की अनुमतिÓ महत्वपूर्ण होती जा रही है।
यह स्थिति सही है तो सवाल बेहद गंभीर है क्या मंत्री का कार्यालय कार्यकर्ताओं और जनता के लिए खुला मंच है या फिर एक निज सचिव के प्रभाव का फिल्टर सिस्टम?
मंत्री के बंगले से जुड़े सूत्रों के हवाले से एक कथित पुराना राजनीतिक प्रसंग भी इन दिनों चर्चा में है। बताया जाता है कि प्रदेश के एक पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंत्री दयाल दास बघेल के साथ उनके निज सचिव संतोष अग्रवाल को देखकर कथित तौर पर मंत्री को उनसे सावधान रहने की सलाह दी थी। भाजपा के भीतर इस कथित टिप्पणी की चर्चा अब इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि निज सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर मौजूदा समय में भी पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं।
चाय से ज्यादा केटली गरम, संतोष अग्रवाल चर्चा में
एक तरफ संगठन के पदाधिकारी सत्ता और संगठन में मजबूती लाने के लिए प्रयासरत है वहीं सरकार के मंत्री के पीए की सींग निकल आने के चर्चा राजनीतिक हलको में जारी है। खाद्य मंत्री दयालदास बघेल की दयालुता को ताक में रखकर मंत्री की छवि खराब करने में संतोष अग्रवाल हमेशा तत्पर रहते है। जबकि केंद्रीय संगठन पदाधिकारी 2029 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर सत्ता और संगठन के बीच सेतु बनाने में जुटे है वहीं छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्रियों के निज सचिवों और ओएसडी की कथित पावर पॉलिटिक्स को लेकर उठ रहे सवालों के समाधान के लिए लगातार बैठकें हो रही है। ताकि विधानसभा चुनाव तक कोई एक्सीडेंटल विवाद सत्ता और संगठन के बीच न हो। अब खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल के निज सचिव संतोष अग्रवाल को लेकर भाजपा के भीतर ही चर्चाओं का बाजार गर्म है। पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर एक निज सचिव के पास ऐसी कौन सी राजनीतिक पावर है कि मंत्री के बंगले से लेकर खाद्य विभाग के गलियारों तक उसकी सक्रियता की चर्चा होने लगी है। मंत्री दयाल दास बघेल की पहचान भाजपा में सहज, सरल और कार्यकर्ताओं के बीच आसानी से उपलब्ध रहने वाले नेता की रही है, लेकिन उनके निज सचिव की कथित कार्यप्रणाली को लेकर इसके उलट शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। भाजपा से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि मंत्री तक पहुंचने वाले नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं पर नजर रखी जाती है और किससे मंत्री की क्या बातचीत हुई, इसका हिसाब रखने की कोशिश होती है। हालांकि इन आरोपों पर निज सचिव या मंत्री की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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