
रायपुर। रोशन साहू 'मोखला'(राजनांदगांव) ने होली पर्व पर पंक्ति ई-मेल किया है।
कोई रंग रहे ना तेरा- मेरा, रंग भी जैसे रंग जाएँ।
शेष रहे ना कोई भी अब, रंग सभी ही मिल जाएँ।।
गिर जाए दीवारें अब तो, हो चाहे कितनी बाधा।
ये जग कहता पूर्ण मुझे, तुझ बिन आधा मैं राधा।।
प्रेम नवांकुर अब तो फूटे,नव गीत अधर पर आए।
जंजीरें टूटे रीत की तब, प्रीत की घुँघरू बँध पाए।।
कभी हँसाता कभी रुलाता, रंगों का खेल निराला।
बाट जोहूँ पल-पल तेरा,अब आ जाओ बृजबाला।।
रहा प्रवासी जन्म से मैं तो,कहीं पाँव न टिक पाए।
नीरस लगता स्वर्ण सिंहासन,ऐश्वर्य कभी न भाए।।
सब ही कहते आप-आप,कोई तुम न कहने वाला।
भाल चूम अब गाल रंगा, हे वृषभानु कीर्ति बाला।।
मुख चूमे री! बयार बासंती, बस तुझको ही गाऊँ।
अधर धरूँ मैं बंशी फिर से, सरगम साँस सुनाऊँ।।
आ गलबहियाँ डार मुझे,है आतुर बाहों की माला।
रंग दीप सब फीकी राधे, बिन तेरे ये नन्द लाला।।
रंग चढ़े न श्याम रंग में,तू देती उलाहना सदा मुझे।
बन जाऊँ स्वयं ही राधा, या दे-दे अपना रंग मुझे।।
धत्त!चुनरिया बड़ी लजीली, नाचे कानों की बाला।
चंपा चमेली गुलाब गूँथू या,मैं ही बन जाऊँ माला।।
हों शाश्वत प्रेम उपासना,अर्थ क्या! निज मान का।
हो स्नेह की न याचना,प्राणों से परिणय प्राण का।।
छलिया-छलिया जग कहे, क्या मैं मन का काला।
अवनी अंबर रंग रंगा दें,आजा बरसाने की बाला।।





