छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला....

SHIDDHANT
1 Nov 2026 8:23 PM IST
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला....
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल सुनने और बोलने में असमर्थ होना किसी व्यक्ति को अपने कानूनी हितों की रक्षा करने में अक्षम नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि शारीरिक अक्षमता और मानसिक अक्षमता अलग-अलग स्थितियां हैं। किसी व्यक्ति को मुकदमे में अपना पक्ष रखने में असमर्थ मानने के लिए उसकी मानसिक क्षमता से संबंधित पर्याप्त आधार होना आवश्यक है।
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने जगदलपुर निवासी महिला की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत के 4 अगस्त 2022 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। महिला ने दीवानी मुकदमे में अपने पति को 'अगला मित्र' (Next Friend) नियुक्त करने की मांग की थी।
सुनने और बोलने में असमर्थ महिला ने लगाई थी याचिका
मामला जगदलपुर निवासी अबेदा बानो से संबंधित है। महिला सुनने और बोलने में असमर्थ है। उसने अपनी शारीरिक स्थिति के आधार पर अदालत से अनुरोध किया था कि उसके पति को मुकदमे में अगला मित्र नियुक्त किया जाए, ताकि वह उसकी ओर से कानूनी कार्यवाही कर सकें। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि महिला की शारीरिक अक्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल इसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह अपने कानूनी हितों की रक्षा करने में असमर्थ है।
अदालत ने माना कि किसी व्यक्ति की मुकदमे में भाग लेने की क्षमता का निर्धारण उसकी वास्तविक परिस्थितियों और मानसिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए।
जमीन के सौदे से जुड़ा है पूरा विवाद
प्रकरण की शुरुआत जमीन के सौदे को लेकर हुए विवाद से हुई थी। जगदलपुर की अबेदा बानो के नाम पर ग्राम नकटीसेमरा में खसरा नंबर 79 की लगभग 1.21 हेक्टेयर जमीन दर्ज थी।
दंतेवाड़ा निवासी राजेश सुराना और सुनीता सुराना ने दावा किया कि अबेदा बानो ने 23 सितंबर 2010 को उनके पक्ष में जमीन बेचने का इकरारनामा किया था।
उनके अनुसार, जमीन का सौदा 12 लाख 8 हजार रुपये में तय हुआ था। इसमें से पांच लाख रुपये अग्रिम भुगतान किए जाने का दावा किया गया। इसी जमीन संबंधी विवाद को लेकर दीवानी मुकदमा अदालत तक पहुंचा।
लिखकर या संकेतों के माध्यम से भी दिया जा सकता है बयान
कानूनी व्यवस्था में बोलने में असमर्थ व्यक्ति के लिए लिखित रूप में या संकेतों के माध्यम से गवाही देने का प्रावधान है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 में ऐसी गवाही की व्यवस्था थी। वर्तमान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 125 में भी इस संबंध में प्रावधान है।
इसके तहत आवश्यकता पड़ने पर अदालत दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता ले सकती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी शारीरिक अक्षमता के कारण न्यायिक प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित न होना पड़े।
निचली अदालत का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर महिला की याचिका स्वीकार नहीं की और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
यह फैसला इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि सुनने या बोलने में असमर्थता अपने आप में मुकदमा लड़ने की अक्षमता का प्रमाण नहीं है। दिव्यांग व्यक्ति भी आवश्यक सहायता और उचित न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
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