छत्तीसगढ़
धान से दलहन-तिलहन की ओर बढ़ रहा महासमुंद, 6 हजार हेक्टेयर में बदली खेती की तस्वीर
Shantanu Roy
16 July 2026 10:59 PM IST

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छग
Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ में खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और जल संरक्षण आधारित बनाने की दिशा में महासमुंद जिला प्रशासन का फसल विविधीकरण अभियान गति पकड़ने लगा है। ऊंची (उच्चहन) भूमि में धान के स्थान पर दलहन, तिलहन, मक्का, रागी, कपास और अन्य वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत अब तक 6,139 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने धान की जगह दूसरी फसलों की बुवाई कर दी है। राज्य शासन की मंशा के अनुरूप कलेक्टर विनय लंगेह के निर्देशन में खरीफ सीजन के दौरान यह अभियान जनभागीदारी के साथ संचालित किया जा रहा है। वर्ष 2026-27 के लिए जिले में 15,150 हेक्टेयर क्षेत्र में धान के स्थान पर दलहन, तिलहन और अन्य वैकल्पिक फसलों का रकबा बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक की प्रगति को देखते हुए प्रशासन इसे सकारात्मक संकेत मान रहा है।जिले के विभिन्न विकासखंडों के लिए अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
महासमुंद विकासखंड में 2,560 हेक्टेयर, बागबाहरा में 3,500 हेक्टेयर, पिथौरा में 2,890 हेक्टेयर, बसना में 2,980 हेक्टेयर तथा सरायपाली में 3,220 हेक्टेयर क्षेत्र में फसल विविधीकरण किया जाना है। अभियान को प्रभावी बनाने के लिए कृषि विभाग गांव-गांव में जागरूकता शिविर आयोजित कर रहा है। इन शिविरों में किसानों को जल उपलब्धता, मिट्टी की प्रकृति और आर्थिक लाभ के आधार पर उपयुक्त फसल चयन की जानकारी दी जा रही है। प्रशासन का फोकस उन क्षेत्रों पर है जहां धान की खेती अपेक्षाकृत कम लाभकारी और अधिक जल खपत वाली है। प्रोत्साहन के रूप में सामान्य भूमि में दलहन और तिलहन की खेती करने वाले किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ का अनुदान दिया जा रहा है। वहीं उच्च भूमि और असिंचित क्षेत्रों में दलहन, तिलहन, रागी तथा कपास की खेती अपनाने पर 10 हजार रुपये प्रति एकड़ की विशेष सहायता का प्रावधान किया गया है।
कृषि उपसंचालक एफ.आर. कश्यप के अनुसार किसानों को गुणवत्तायुक्त बीजों का नियमित वितरण किया जा रहा है। विभिन्न गांवों में मॉडल प्लॉट विकसित कर आधुनिक तकनीकों और वैकल्पिक खेती का प्रदर्शन भी किया जा रहा है, ताकि किसान प्रत्यक्ष रूप से इसके लाभ देख सकें।ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी लगातार किसानों के संपर्क में रहकर फसल चयन, बीज उपचार, उर्वरक प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन दे रहे हैं। किसानों की समस्याओं का मौके पर समाधान भी किया जा रहा है। जिला प्रशासन का मानना है कि ऊंची भूमि में धान की तुलना में दलहन और तिलहन की खेती कम पानी में बेहतर उत्पादन देती है। इससे भूजल संरक्षण, उत्पादन लागत में कमी, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और किसानों की आय में वृद्धि संभव है। विशेष रूप से दलहन फसलें भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाती हैं, जिससे अगली फसलों को भी लाभ मिलता है।अभियान का असर अब गांवों में दिखाई देने लगा है। ग्राम कस्तुरबोड़ के किसान चैन सिंह मरार ने एक हेक्टेयर भूमि में धान की जगह मक्का की खेती शुरू की है। वहीं दाबपाली, चपिया, जमदरहा, पुरुषोत्तमपुर और बोदानवापाली सहित कई गांवों में भी किसानों को वैकल्पिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
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