
धमतरी। छत्तीसगढ़ राज के जब बात आथे,त इहाँ के लोक-कला-संस्कृति,धरम-आस्था-विश्वास,बोली-भाखा,मेला-मड़ाई के सुंदर स्वरूप हर हमर मन म चित्र सहीं अपने- अपन झलक जाथे।ए सब के दर्शन हर हमर गाँव- गंवई म ही होथे,जिहाँ ल हाट-बज़ार,मेला-मड़ई,मातर-मतराही,अउ किसम-किसम के परब-परम्परा ल हमर पुरखा के सियान- सामरथ मन धरोहर के रूप म संजो के रखे हावय।ए परब-परम्परा ल जिवंत राखे अउ मनाय के पाछु म कुछु न कुछु जरूर कारण हावय।जेला हमर गाँव-गंवई म आज भी अब्बड़ धूमधाम के साथ मनाय जावत हे।
वईसे देखे जाए त ए सब ह एक तरह ले,हमर कुल देवता से लेकर हमर नेंग बढ़ाई तक,जनम से लेकर मरण तक, हमर लोक संस्कृति से लेकर संस्कार तक, धरम-करम से लेकर उनकर आस्था- विस्वास तक, मेल-मिलाप से लेकर मया दुलार,सुम्मति तक,अउ जम्मो नाता-रिश्ता से लेकर सगा-सहोदर तक म देखे ल मिलथे।जेहर हमन ल सुग्घर संदेश देवत रहिथे।अउ ए सब सुंदर स्वरूप के दर्शन माघी पूर्णिमा ले होथे।जेहर जेठ मास के आख़री दिन तक चलत रहिथे।हमन बात करथन मेला,मड़ई अउ नवरात के। अईसे मेला-मड़ई,अउ नवरात्र के सुग्घर समागम हमन ल कुरुद म देखे ल मिलथे।
ए कुरुद हर रायपुर से लगभग ६० किलोमीटर दूरिहा दक्षिण दिशा म राष्ट्रीय मुख्य मार्ग म जिला धमतरी से पहिली परथे।जिहाँ ल महाकाली के संगे-संग छत्तीसगढ़ महतारी के जीवंत मूर्ति ल स्थापित करे गय हावय।एकर स्थापना करे रिहिस हे ओ समय के तात्कालिक विधायक गुरमुख सिंह होरा ।जेकर परिकल्पना करे रिहिस छत्तीसगढ़ महान विभूति कवि संत पवन दिवान हा।फेर ए दुनो मूर्ति महाकाली अउ छत्तीसगढ़ महतारी के प्राण-प्रतिष्ठा हर 20 मार्च 1996 के पावन दिवस म सम्पन्न होईस।ए मंदिर ह अपन आप म एक अलग महत्व रखते अउ पहिचान बनाथे।एकर पहिचान बनाए के एक विशेष कारण भी हावय।"सम्मक छत्तीसगढ़ राज म ए हर एक ठन मात्र अईसे मंदिर बने हावय जिहाँ ल छत्तीसागढ़ महतारी के अब्बड़ सुग्घर सजीव जीवंत मूर्ति स्थापित करे गे हावय।ए मूर्ति ल देखे ले अईसे लागथे जईसे हमर राज के कला- संस्कृति,सुख-समृद्धि,धनहा-धरा-धरोहर,हरियर बखरी-बारी ह साक्षात मूर्ति के रूप म जीवन्त हो गे हावय।अईसनहे माता काली ल देख के अईसे लागथे जईसे हमर राज ले भय,भूख,भ्रष्टाचार ल खत्म करे बर छत्तीसगढ़ माता हर प्रगट हो गे हावय।"अईसे महिमा ल संजोए खातिर छत्तीसगढ़ महतारी अउ काली माता के भव्य मंदिर के तीर म हर बछर चैत्र नवरात्र म मेला भराथे।इहां ल काली माता के सेवा म पावन ज्योति कलश के स्थापना भी करे जाथे।अउ आस-पास सहित दुर-दराज गाँव शहर नगर के श्रद्धालु मन इहाँ के मेला म आथें।अउ मेला म किंजर के दुनो माता के दर्शन कर के पुण्य फल प्राप्त करथें।ए मेला ह अंचल के सबले बड़े मेला,अउ आखिरी मेला माने जाथे,ते पाय के ए मेला हर,जनमानस ल अपन कोती बरबस ही अपन कती आकर्षित करथे।पूरा नौ दिन इहाँ मेला झमाझम भराय रहिथे।माता के दरबार म माता सेवा के गीत गुंजत रहिथे।मेला म पारम्परिक अउ अति आधुनिक सामान सहित मनोरंजन के दुकान,खचाखच लगे रहिथे।इहाँ पहुँच के जनमानस उत्साह से भर जाथे।जिहाँ ल हिरीत-पिरीत, मेल-मिलाप,अउ श्रद्धा-भक्ति के सुग्घर दर्शन होथे। अईसे पावन मेला म हमर छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति,लोक परम्परा, सामाजिक समरसता,भाईचारा,के भाव हर समृद्ध हो जाथे।





