छत्तीसगढ़

जीना है तो जीने की जिद है क्योंकि हारना तो हमने कभी सीखा ही नहीं...

Nil dhankar
29 Nov 2025 11:25 AM IST
जीना है तो जीने की जिद है क्योंकि हारना तो हमने कभी सीखा ही नहीं...
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ज़ाकिर घुरसेना/ कैलाश यादव

आफत कई प्रकार की होती है एक आफत नए मंत्री जी पर आ गई है अपने ड्राइवर को पीए बनाने से दूसरी तरफ एक मंत्री जी के बेटे के कारण आफत उनके पीछे पड़ गई है दरअसल उनके बेटे के पास ऑफिस का ई लॉगिन पासवर्ड होने से सभी कामों में उनका ही दखल होना बताया जा रहा है। चौपाटी हटने के बाद वहां दुकान लगा रहे लोगों के परिवारों पर आफत आई हुई है सब परेशान कि आगे क्या होगा। खैर उनको दूसरी जगह व्यवस्थापन तो कर दिया गया है लेकिन अभी नई गाइडलाइन जारी होने के बाद एक आफत और दिखने लगी है। विपक्षी बस्तर से लेकर सरगुजा तक सरायपाली से लेकर डोगरगढ़ तक लगातार आंदोलन चला रहे हैं। लोग आरोप लगा रहे हैं कि अफसर बंद कमरे में बैठकर जो सलाह दिये सरकार ने उसी लिखित आंकड़ों के आधार पर गाइडलाइन जारी कर दी।किसानों एवं जमीन कारोबारियो ने कहा है कि आने वाले दिनों में लगभग 1 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार होकर सडक़ में होंगे,वजह बढ़ी हुई गाइड लाइन दर को लेकर। बरोजगार होंगे या काम ज्यादा मिलेगा ये तो वक्त बताएगा लेकिन ये जरूरी है कि फिलहाल सब परेशान हो गए हैं चाहे किसान हो या बिल्डर। ऐसा लग रहा है सरकार ने सबको एक प्लेटफार्म में ला दिया है सब एक बरोबर हो गए हैं। हां ये जरूर है कि एक प्लेटफार्म में सिर्फ नफा नुकसान के लिए ही खड़े हैं सरकार ने जहां गाइड लाइन पर संशोधन किया फिर सबके रास्ते अलग अलग हो जाएंगे। जगह जगह धरना प्रदर्शन ही होने लगे हैं क्रेडाई वाले सीएम साहब से भी मिलकर रेट कम करने की गुहार लगा चुके हैं। अब देखना है क्या फैसला होता है। सब जगह अलग अलग परेशानी से लोग जूझ रहे हैं बिलासपुर का मामला ही अलग है बताते हैं कि वहां गाइड लाइन के लिए नहीं बल्कि वहां छोटे प्लाट की रजिस्ट्री ही नहीं हो रही है चाहे डायवर्टेड क्यों ना हो। बताया जाता है कि बिलासपुर में बड़े बिल्डर की चलती है उसके अनुरूप ही कार्य संपन्न होते हैं। उनके वजह से ही आम जनता और बिल्डरों टेंशन बना हुआ है और राजधानी में बिल्डर और आम जनता एक साथ दिख रहे हैं। जनता में खुसर फुसुर है कि एक ही प्रदेश में अलग अलग नियम ये समझ में नहीं आ रहा। खैर आफत तो आते-जाते रहती है इससे निजात पाना ही कला है। इसी बात पर किसी ने ठीक ही कहा है, जीना है तो जीने की जिद है, क्योंकि, हारना तो हमने कभी सीखा ही नहीं...।

मप्र की हवा का असर छत्तीसगढ़ में ...

मध्यप्रदेश जनसम्पर्क विभाग में राज्य प्रशासनिक सेवा (एसएएस) के अधिकारी की उच्च पदस्थापना को लेकर उठे विवाद पर अब छत्तीसगढ़ से भी समर्थन की आवाज़ उठी है। छत्तीसगढ़ जनसम्पर्क अधिकारी संघ ने इस निर्णय के खिलाफ मध्यप्रदेश के अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई कलमबंद हड़ताल को अपना पूर्ण समर्थन दिया है। रणनीतिक संचार, मीडिया प्रबंधन, जनभावना विश्लेषण एवं सरकारी नीतियों के प्रभावी प्रसार जैसी जिम्मेदारियाँ गहन अनुभव और तकनीकी दक्षता की मांग करती हैं। ऐसे में अन्य सेवाओं से प्रतिनियोजन अथवा प्रतिनियुक्ति के आधार पर की गई नियुक्तियाँ संवर्ग की मूल भावना को कमजोर करती हैं और विभागीय मनोबल को आहत करती हैं। मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग के अधिकारी जिस कारण से विरोध और कलमबंद हड़ताल कर रहे हैं, वे कारण पूर्णत: उचित और संवर्गीय गरिमा के अनुरूप हैं। छत्तीसगढ़ जनसंपर्क अधिकारी संघ उनकी मांगों का पूर्ण समर्थन करता है संघ के अध्यक्ष बालमुकुंद तंबोली ने कहा कि संघ का यह स्पष्ट मत है कि जनसंपर्क एक विशिष्ट एवं विशेषज्ञता-आधारित संवर्ग है, जिसमें उच्च पदस्थापना केवल अनुभवी एवं प्रशिक्षित पीआर कैडर के अधिकारियों को ही दी जानी चाहिए। बालमुकुंद तंबोली ने कहा कि जनसंपर्क विभाग के अपर संचालक के पद पर राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को नियुक्त करने का निर्णय न केवल जनसंपर्क संवर्ग की स्थापित परंपराओं के विपरीत है, बल्कि विभागीय कार्यकुशलता, पेशेवर मानकों और संवर्गीय स्वायत्तता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जनता में खुसुर-फुसुर है कि मप्र के सीएम मोहन यादव की तरह छत्तीसगढ़ में नियुक्ति न हो इसके लिए मोर्चा खोलकर मप्र के हड़ताल को समर्थन दिया जा रहा है।

हर व्यक्ति को मिले वोट का अधिकार

दिल्ली रवाना से पहले कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट ने रायपुर एयरपोर्ट पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि जहां-जहां स्ढ्ढक्र का काम चल रहा है वहां हमारी पार्टी को मजबूती से अपना पक्ष रखना होगा। हम चाहते हैं कि हर व्यक्ति को वोट का अधिकार मिलना चाहिए। पायलट ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर क्या वजह है कि स्ढ्ढक्र के लिए इतनी हड़बड़ी की जा रही है, जबकि अभी कोई चुनाव भी नहीं है। पायलट ने कहा, इसके पहले भी स्ढ्ढक्र हुए हैं, लेकिन इस बार क्चरुह्र पर ज्यादा दबाव बनाया जा रहा है इसलिए वो आत्महत्या कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग की भूमिका संदेहास्पद है। एक विधायक जो तीन बार चुनाव लड़ चुके हैं उनका नाम जहां के वे हैं वहां से काटकर कहीं दूसरी जगह आ गया है। जब विधायक के साथ ऐसा हो रहा है तो आम मतदाता के साथ क्या हो रहा होगा। उन्होंने कहा, स्ढ्ढक्र के लिए 4 दिसंबर तक का समय पर्याप्त नहीं है। हमने निर्वाचन आयोग से इसे बढ़ाने की मांग की है।जनता में खुसुर-फुसुर है कि बीती ताही बिसार दे आगे की सुध लेई, चुनाव से पहले चुनाव को लोकर भाषण बाजी के बजाय कांग्रेसियों को अपने लीडरशिप में सुधार करना चाहिए ताकि जनता का विश्वास जीत सके। एसआईआर पर बयानबाजी कर वक्त खराब नहीं करनी चाहिए उसे कैसे भुनाए इस पर फोकस करनी चाहिए ।

पानी में रहकर मगरमच्छ से दुश्मनी नहीं पालना चाहिए...

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रायपुर आगमन के पहले आईएएस अधिकारियों के तबादले को लेकर तरह तरह की चर्चा होने लगी है। कोई कह रहा है रूटीन तबादले हैं तो कोई कह रहा है परफॉर्मेंस को देखते हुए तबादले किये गए हैं। खैर किसे कहाँ रखना है किसे क्या जिम्मेदारी देनी है ये सरकार का काम है फिर भी लोग कयास तो लगाते ही हैं। कई बड़े पोर्टफोलियो वालों को एकदम से इधर उधर कर दिया गया है आईएएस प्रियंका शुक्ला के बारे में बोले तो उन्हें डायरेक्टर हेल्थ, कमिश्नर हेल्थ सर्विसेज और एमडी नेशनल हेल्थ मिशन जैसे महत्वपूर्ण पदों से उन्हें एक झटके में बाहर कर दिया है। उन्हें अब शिक्षा विभाग में पाठ्यपुस्तक निगम, समग्र शिक्षा आदि में जिम्मेदारी सौंपी गई है। मंत्रालय के गलियारे में चर्चा हो रही थी कि दरअसल मैडम स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी ही नहीं सरकार, सत्ताधारी संगठन के आंखों की भी किरकिरी बन गई थी। अपने आगे भी किसी को कुछ नहीं समझती थी। स्वास्थ्य मंत्री,स्वास्थ्य सचिव की बात काटने में वह परहेज नहीं करती। मैं ही श्रेष्ठ हूं! ऐसी गलतफहमी मैडम पाल बैठी थी। जिस वजह से ऐसे कई मामले सामने आए जिसके चलते स्वास्थ्य मंत्री को अपमानित और सरकार को शर्मसार होना पड़ा था। ताजा मामला ये बताया जा रहा है कि एनएचएम कर्मचारियों की हड़ताल समाप्ति के बाद भी वे समझौते से मुकरती रही। सूत्र बताते हैं कि एनएचएम के बर्खास्त 25 कर्मचारी नेताओं की बहाली पर ब्रेकर बन गयीं थीं। इसकी वजह तो वे ही बता सकती हैं। और यह भी खबर थी कि देरसबेर कर्मचारी फिर से आंदोलन के मूड बना रहे थे यानी मंत्री, विभाग और सरकार की किरकिरी होती। जनता में खुसुर फुसुर है कि पानी में रहकर मगरमच्छ से दुश्मनी पालना दिमाग का काम नहीं है। सबका साथ सबका विकास जरुरी है।

ठण्ड में गर्मी का अहसास

कुछ दिनों से ठण्ड गायब सी हो गई थी , अब फिर से अपना तेवर दिखाने लगी है। बताया जा रहा है कि जशपुर में पारा तीन डिग्री से नीचे चला गया है। खेतों में बर्फ की सफ़ेद चादर दिखने लगी जिसने धान और सब्जी के किसानों के माथे पर पसीना ला दिया है। बताया जा रहा है की कई वर्षों का रिकार्ड टूट गया है खैर रिकार्ड टूटे न टूटे राजधानी में जरूर टूटने लगा है नई गाइड लाइन से राजधानी में सियासी पारा कई डिग्री ऊपर हो गया है बिल्डर, नेता जमींन दलाल और अन्य लोगों के भी माथे पर पसीना ला दिया है। अब जशपुर की ठण्ड से किसानों और सब्जी उत्पादकों या राजधानी की सियासी गर्मी हो पसीना दोनों जगह निकल रही है। जनता में खुसुर फुसुर है कि राजधानी में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के दौरे ने अधिकारियों और कर्मचारियों के भी माथे पर पसीना ला दिया है। मतलब ठंडी में गर्मी का अहसास होने लगा है राजधानीवासियों को।

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