तलाक लेने पत्नी को बता दिया मानसिक रोगी, हाईकोर्ट से पति की याचिका खारिज

बिलासपुर। पति ने अपनी पत्नी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बता तलाक की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में आवेदन दिया, लेकिन कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं कर सका। इस पर फैमिली कोर्ट ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। पति ने फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने कहा कि विवाह को शून्य घोषित करने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं। पति ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ थी। रायगढ़ निवासी एक मुस्लिम व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट में अर्जी दायर कर बताया कि उसका और उसकी पत्नी का विवाह 29 दिसंबर 2007 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उसने तर्क दिया कि मुस्लिम कानून के तहत विवाह एक अनुबंध होता है और यह अनुबंध धोखे से कराया गया।
पति का आरोप था कि शादी के बाद पत्नी का व्यवहार असामान्य था। वह अचानक गुस्सा हो जाती, मारपीट करती, आत्महत्या की कोशिश करती और धारदार हथियार से हमला करती। इसके बावजूद उसने वैवाहिक जीवन निभाने की कोशिश की। इस दौरान, 13 सितंबर 2008 को उनकी जुड़वां बेटियां हुईं। पति के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने एकपक्षीय सुनवाई में भी उसके पक्ष में फैसला नहीं दिया, जबकि पत्नी ने कोई सबूत पेश नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कोर्ट ने पति द्वारा प्रस्तुत महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नजरअंदाज किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि पति यह साबित नहीं कर सका कि विवाह के समय पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ थी और यह तथ्य उसके माता-पिता ने छिपाया। उसने कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, न ही किसी डॉक्टर की गवाही दर्ज कराई। गवाहों ने भी यह नहीं कहा कि विवाह के समय पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ थी। इस आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी।
पति की दलील: पत्नी की मानसिक स्थिति के कारण कारोबार प्रभावित पति ने बताया कि वह कपड़े का व्यवसाय करता है और उसे अक्सर घर से बाहर रहना पड़ता था। हालांकि, पत्नी की मानसिक स्थिति के कारण उसे बच्चों की देखभाल करनी पड़ती, जिससे उसका कारोबार प्रभावित हुआ। अगस्त 2019 में पत्नी की हालत और बिगड़ गई। वह आक्रामक हो गई और पति व बेटियों के लिए खतरा बनने लगी। 31 अगस्त 2019 को पति उसे इलाज के लिए रांची के सेंट्रल मेंटल हॉस्पिटल ले गया, जहां 2 सितंबर 2019 को उसे भर्ती किया गया। 5 नवंबर 2019 तक इलाज चला, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद 6 नवंबर 2019 को वह मायके चली गई। पत्नी ने न नोटिस का जवाब दिया न पेश हुई पति के आवेदन पर फैमिली कोर्ट ने पत्नी को नोटिस जारी किया, लेकिन कोरोना महामारी के कारण वह 16 अगस्त 2021 को उपस्थित नहीं हो सकी। बाद में समाचार पत्र और पंजीकृत डाक से भी नोटिस भेजा गया, लेकिन वह अनुपस्थित रही। इसके बाद कोर्ट ने एकपक्षीय कार्रवाई की। पति ने 23 अक्टूबर 2021 को अपना बयान दर्ज कराया और चार गवाह पेश किए। हालांकि, ठोस सबूत नहीं होने के कारण फैमिली कोर्ट ने 24 दिसंबर 2021 को उसका दावा खारिज कर दिया।





