छत्तीसगढ़
राजस्व प्रकरण में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धारा 170(ख) के गलत इस्तेमाल पर रोक
Shantanu Roy
10 Feb 2026 7:42 PM IST

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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण राजस्व विवाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अनुसूचित जनजाति से संबंधित भूमि हस्तांतरण कानूनों की व्याख्या को स्पष्ट किया है। जस्टिस बीडी गुरु ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170(ख) केवल उन्हीं मामलों में लागू हो सकती है, जहां यह विधिवत सिद्ध हो जाए कि अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति द्वारा गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि का हस्तांतरण हुआ है। मौजूदा प्रकरण में यह मूल तथ्य ही सिद्ध नहीं हो पाया, ऐसे में धारा 170(ख) के तहत की गई पूरी कार्यवाही क्षेत्राधिकार से बाहर है। हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के आदेश को कानून का गंभीर उल्लंघन करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्षेत्र-विशिष्ट होता है और इसका निर्धारण केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से ही किया जा सकता है। किसी भी न्यायालय को अनुसूचित जनजातियों की अधिसूचित सूची में जोड़-घटाव या संशोधन करने का अधिकार नहीं है।
क्या है पूरा मामला
मामले की शुरुआत एक भूमि विवाद से हुई, जिसमें याचिकाकर्ता ने स्थायी निषेधाज्ञा तथा वैकल्पिक रूप से विवादित भूमि का कब्जा प्राप्त करने के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि विवादित भूमि 11 मार्च 1977 से पहले राजस्व अभिलेखों में सत्राजित सिंह के वंशज अशोक कुमार सिंह और मनहरन सिंह के नाम पर दर्ज थी। विधिवत सत्यापन के बाद याचिकाकर्ता ने उक्त भूमि को 11 मार्च 1977 को पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से मात्र 1000 रुपये में खरीदा। खरीद के बाद 28 मई 1977 को भूमि याचिकाकर्ता के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो गई। याचिकाकर्ता तभी से भूमि पर काबिज रहा और खेती करता रहा। मामला शांतिपूर्वक चल रहा था, लेकिन 22 सितंबर 2004 को प्रतिवादी गुनाराम, गजाराम और लच्छाराम ने याचिकाकर्ता को धमकाया कि उन्होंने विवादित भूमि के अभिलेखों से उसका नाम हटाकर अपना नाम दर्ज करा लिया है और अब भूमि का कब्जा उन्हें सौंप दिया जाए।
अनुसूचित जनजाति होने का दावा
याचिकाकर्ता ने अदालत में बताया कि प्रतिवादियों ने स्वयं को अनुसूचित जनजाति का सदस्य बताकर राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज कराया है, जबकि वे ‘शिकारी’ जाति से संबंध रखते हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार शिकारी जाति जांजगीर तहसील में अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित नहीं है। इसलिए यदि प्रतिवादियों ने स्वयं को अनुसूचित जनजाति बताकर नाम दर्ज कराया है, तो वह आदेश अवैध, अधिकार क्षेत्र से बाहर और याचिकाकर्ता पर बाध्यकारी नहीं है।
प्रतिवादियों का पक्ष
प्रतिवादियों ने अपने लिखित बयान में याचिकाकर्ता के स्वामित्व और कब्जे से इनकार किया। उनका कहना था कि विवादित भूमि मूल रूप से शिकारी समुदाय के खोलबहरा और शिवसिंह की थी, जो आदिवासी समुदाय से संबंधित थे। सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना भूमि को अवैध रूप से सत्राजित सिंह के नाम पर हस्तांतरित किया गया था। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने कभी वैध स्वामित्व या कब्जा प्राप्त नहीं किया। प्रतिवादियों ने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता की धारा 170(बी) के तहत जांजगीर के उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष कार्यवाही शुरू की गई थी, जिसमें सुनवाई के बाद भूमि उनके पक्ष में बहाल करने का आदेश पारित किया गया था और उन्हें कब्जा सौंप दिया गया था। प्रतिवादियों का कहना था कि याचिकाकर्ता ने इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी।
सिविल न्यायालय के अधिकार क्षेत्र पर विवाद
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संहिता की धारा 170(बी) और 257 के तहत सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित नहीं होता, क्योंकि जब धारा 170(ख) का ही गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया हो, तब राजस्व न्यायालय का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर माना जाएगा। वहीं प्रतिवादियों की ओर से यह कहा गया कि मामला राजस्व न्यायालय के अनन्य क्षेत्राधिकार में आता है और सिविल कोर्ट को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।
प्रथम अपीलीय न्यायालय का आदेश
प्रथम अपीलीय न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा था कि 15 जनवरी 1965 की बिक्री के समय शिकारी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया था। इस आधार पर रामहू नामक आदिवासी द्वारा गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि हस्तांतरण को धारा 170(ख) के अंतर्गत माना गया। अपीलीय न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 170(ख) के तहत कार्यवाही राजस्व न्यायालय के अनन्य क्षेत्राधिकार में आती है और धारा 257 के तहत सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।
हाईकोर्ट में चुनौती
इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने जांजगीर-चांपा जिले में शिकारी जाति को अनुसूचित जनजाति मानकर कानून की गंभीर त्रुटि की है। संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 और उसके संशोधन के अनुसार शिकारी समुदाय को केवल बिलासपुर जिले की बिलासपुर और कटघोरा तहसीलों में ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। जांजगीर जिले की पामगढ़ तहसील का इसमें कोई उल्लेख नहीं है।
हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड, अधिसूचनाओं और आदेश पुस्तिका की गहन जांच के बाद पाया कि जांजगीर और पामगढ़ तहसील में शिकारी जाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। यह तथ्य पामगढ़ के नायब तहसीलदार द्वारा 14 जनवरी 2008 को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया था। जस्टिस बीडी गुरु ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में प्रारंभिक रूप से शिकारी समुदाय का कोई उल्लेख नहीं था। पहली बार 20 सितंबर 1976 की अधिसूचना में इसका जिक्र आया, वह भी सीमित क्षेत्रों के लिए। ऐसे में जांजगीर जिले में शिकारी जाति को अनुसूचित जनजाति मानने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।
धारा 170(ख) पर अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि धारा 170(ख) तभी लागू होती है, जब अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि हस्तांतरित करता है और यह तथ्य अधिसूचित क्षेत्र में सिद्ध होता है। जब हस्तांतरणकर्ता का अनुसूचित जनजाति से संबंधित होना ही सिद्ध नहीं हुआ, तो पूरी कार्यवाही अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
तल्ख टिप्पणी और अंतिम आदेश
जस्टिस बीडी गुरु ने कहा कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने न केवल अनुसूचित जनजाति के दर्जे को लेकर बल्कि ट्रायल कोर्ट के सुविचारित निर्णय को पलटने में भी गंभीर कानूनी गलती की है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 31 जुलाई 2010 के निर्णय और डिक्री को बहाल करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। यह फैसला न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति से जुड़े भूमि मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि क्षेत्र-विशिष्ट अधिसूचनाओं की अनदेखी कर अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता और राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित ऐसे आदेश सिविल न्यायालय की समीक्षा से बाहर नहीं होंगे।
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